Followers

Tuesday, 3 September 2024

3 सितम्बर/बलिदान-दिवस बाल बलिदानी कुमारी मैना

3 सितम्बर/बलिदान-दिवस

बाल बलिदानी कुमारी मैना

3 सितम्बर/बलिदान-दिवस

बाल बलिदानी कुमारी मैना


1857 के स्वाधीनता संग्राम में प्रारम्भ में तो भारतीय पक्ष की जीत हुई; पर फिर अंग्रेजों का पलड़ा भारी होने लगा। भारतीय सेनानियों का नेतृत्व नाना साहब पेशवा कर रहे थे। उन्होंने अपने सहयोगियों के आग्रह पर बिठूर का महल छोड़ने का निर्णय कर लिया। उनकी योजना थी कि किसी सुरक्षित स्थान पर जाकर फिर से सेना एकत्र करें और अंग्रेजों ने नये सिरे से मोर्चा लें।


मैना नानासाहब की दत्तक पुत्री थी। वह उस समय केवल 13 वर्ष की थी। नानासाहब बड़े असमंजस में थे कि उसका क्या करें ? नये स्थान पर पहुंचने में न जाने कितने दिन लगें और मार्ग में न जाने कैसी कठिनाइयां आयें। अतः उसे साथ रखना खतरे से खाली नहीं था; पर महल में छोड़ना भी कठिन था। ऐसे में मैना ने स्वयं महल में रुकने की इच्छा प्रकट की।


नानासाहब ने उसे समझाया कि अंग्रेज अपने बन्दियों से बहुत दुष्टता का व्यवहार करते हैं। फिर मैना तो एक कन्या थी। अतः उसके साथ दुराचार भी हो सकता था; पर मैना साहसी लड़की थी। उसने अस्त्र-शस्त्र चलाना भी सीखा था। उसने कहा कि मैं क्रांतिकारी की पुत्री होने के साथ ही एक हिन्दू ललना भी हूं। मुझे अपने शरीर और नारी धर्म की रक्षा करना आता है। अतः नानासाहब ने विवश होकर कुछ विश्वस्त सैनिकों के साथ उसे वहीं छोड़ दिया।


पर कुछ दिन बाद ही अंग्रेज सेनापति हे ने गुप्तचरों से सूचना पाकर महल को घेर लिया और तोपों से गोले दागने लगा। इस पर मैना बाहर आ गयी। सेनापति हे नाना साहब के दरबार में प्रायः आता था। अतः उसकी बेटी मेरी से मैना की अच्छी मित्रता हो गयी थी। मैना ने यह संदर्भ देकर उसे महल गिराने से रोका; पर जनरल आउटरम के आदेश के कारण सेनापति हे विवश था। अतः उसने मैना को गिरफ्तार करने का आदेश दिया।


पर मैना को महल के सब गुप्त रास्ते और तहखानों की जानकारी थी। जैसे ही सैनिक उसे पकड़ने के लिए आगे बढ़े, वह वहां से गायब हो गयी। सेनापति के आदेश पर फिर से तोपें आग उगलने लगीं और कुछ ही घंटों में वह महल ध्वस्त हो गया। सेनापति ने सोचा कि मैना भी उस महल में दब कर मर गयी होगी। अतः वह वापस अपने निवास पर लौट आया।


पर मैना जीवित थी। रात में वह अपने गुप्त ठिकाने से बाहर आकर यह विचार करने लगी कि उसे अब क्या करना चाहिए ? उसे मालूम नहीं था कि महल ध्वस्त होने के बाद भी कुछ सैनिक वहां तैनात हैं। ऐसे दो सैनिकों ने उसे पकड़ कर जनरल आउटरम के सामने प्रस्तुत कर दिया।


नानासाहब पर एक लाख रु. का पुरस्कार घोषित था। जनरल आउटरम उन्हें पकड़ कर आंदोलन को पूरी तरह कुचलना तथा ब्रिटेन में बैठे शासकों से बड़ा पुरस्कार पाना चाहता था। उसने सोचा कि मैना छोटी सी बच्ची है। अतः पहले उसे प्यार से समझाया गया; पर मैना चुप रही। यह देखकर उसे जिन्दा जला देने की धमकी दी गयी; पर मैना इससे भी विचलित नहीं हुई।


अंततः आउटरम ने उसे पेड़ से बांधकर जलाने का आदेश दे दिया। निर्दयी सैनिकों ने ऐसा ही किया। तीन सितम्बर, 1857 की रात में 13 वर्षीय मैना चुपचाप आग में जल गयी। इस प्रकार उसने देश के लिए बलिदान होने वाले बच्चों की सूची में अपना नाम स्वर्णाक्षरों में लिखवा लिया।

Thursday, 1 August 2024

*📜 31 जुलाई 📜* *🌹 अमर शहीद ऊधम सिंह // बलिदान दिवस 🌹*

 *📜 31 जुलाई 📜*


*🌹 अमर शहीद ऊधम सिंह // बलिदान दिवस 🌹*


*जन्म : 26 दिसंबर 1899*

*मृत्यु : 31 जुलाई 1940*


लोगों में आम धारणा है कि ऊधम सिंह ने जनरल डायर को मारकर जलियाँवाला बाग हत्याकांड का बदला लिया था लेकिन भारत के इस सपूत ने डायर को नहीं बल्कि माइकल ओडवायर को मारा था जो अमृतसर में बैसाखी के दिन हुए नरसंहार के समय पंजाब प्रांत का गवर्नर था।


ओडवायर के आदेश पर ही जनरल डायर ने जलियाँवाला बाग में सभा कर रहे निर्दोष लोगों पर अंधाधुँध गोलियाँ बरसाई थीं। ऊधम सिंह इस घटना के लिए ओडवायर को जिम्मेदार मानते थे।


26 दिसंबर 1899 को पंजाब के संगरूर जिले के सुनाम गाँव में जन्मे ऊधम सिंह ने जलियाँवाला बाग में हुए नरसंहार का बदला लेने की प्रतिज्ञा की थी जिसे उन्होंने अपने सैकड़ों देशवासियों की सामूहिक हत्या के 21 साल बाद खुद अंग्रेजों के घर में जाकर पूरा किया।


ऊधम सिंह अनाथ थे। सन् 1901 में ऊधम सिंह की माता और 1907 में उनके पिता का निधन हो गया। इस घटना के चलते उन्हें अपने बड़े भाई के साथ अमृतसर के एक अनाथालय में शरण लेनी पड़ी। ऊधम सिंह का बचपन का नाम शेर सिंह और उनके भाई का नाम मुक्ता सिंह था, जिन्हें अनाथालय में क्रमश: ऊधम सिंह और साधु सिंह के रूप में नए नाम मिले। अनाथालय में ऊधम सिंह की जिन्दगी चल ही रही थी कि 1917 में उनके बड़े भाई का भी देहांत हो गया और वह दुनिया में एकदम अकेले रह गए। 1919 में उन्होंने अनाथालय छोड़ दिया और क्रांतिकारियों के साथ मिलकर आजादी की लड़ाई में शामिल हो गए।


डॉ. सत्यपाल और सैफुद्दीन किचलू की गिरफ्तारी तथा रोलट एक्ट के विरोध में अमृतसर के जलियाँवाला बाग में लोगों ने 13 अप्रैल 1919 को बैसाखी के दिन एक सभा रखी जिसमें ऊधम सिंह लोगों को पानी पिलाने का काम कर रहे थे। इस सभा से तिलमिलाए पंजाब के तत्कालीन गवर्नर माइकल ओडवायर ने ब्रिगेडियर जनरल रेजीनल्ड डायर को आदेश दिया कि वह भारतीयों को सबक सिखा दें। इस पर जनरल डायर ने 90 सैनिकों को लेकर जलियाँवाला बाग को घेर लिया और मशीनगनों से अंधाधुंध गोलीबारी कर दी जिसमें सैकड़ों भारतीय मारे गए। जान बचाने के लिए बहुत से लोगों ने पार्क में मौजूद कुएँ में छलाँग लगा दी। 


बाग में लगी पट्टिका पर लिखा है कि 120 शव तो सिर्फ कुएँ से ही मिले। आधिकारिक रूप से मरने वालों की संख्या 379 बताई गई जबकि पंडित मदन मोहन मालवीय के अनुसार कम से कम 1300 लोग मारे गए थे। स्वामी श्रद्धानंद के अनुसार मरने वालों की संख्या 1500 से अधिक थी, जबकि अमृतसर के तत्कालीन सिविल सर्जन डॉक्टर स्मिथ के अनुसार मरने वालों की संख्या 1800 से अधिक थी।


राजनीतिक कारणों से जलियाँवाला बाग में मारे गए लोगों की सही संख्या कभी सामने नहीं आ पाई। इस घटना से वीर ऊधम सिंह तिलमिला गए और उन्होंने जलियाँवाला बाग की मिट्टी हाथ में लेकर माइकल ओडवायर को सबक सिखाने की प्रतिज्ञा ले ली।


ऊधम सिंह अपने काम को अंजाम देने के उद्देश्य से 1934 में लंदन पहुँचे। वहाँ उन्होंने एक कार और एक रिवाल्वर खरीदी तथा उचित समय का इंतजार करने लगे। भारत के इस योद्धा को जिस मौके का इंतजार था, वह उन्हें 13 मार्च 1940 को उस समय मिला जब माइकल ओडवायर लंदन के काक्सटन हाल में एक सभा में शामिल होने के लिए गया। ऊधम सिंह ने एक मोटी किताब के पन्नों को रिवाल्वर के आकार में काटा और उनमें रिवाल्वर छिपाकर हाल के भीतर घुसने में कामयाब हो गए।


सभा के अंत में मोर्चा संभालकर उन्होंने ओडवायर को निशाना बनाकर गोलियाँ दागनी शुरू कर दीं। ओडवायर को दो गोलियाँ लगीं और वह वहीं ढेर हो गया। अदालत में ऊधम सिंह से पूछा गया कि जब उनके पास और भी गोलियाँ बचीं थीं, तो उन्होंने उस महिला को गोली क्यों नहीं मारी जिसने उन्हें पकड़ा था। इस पर ऊधम सिंह ने जवाब दिया- हाँ ऐसा कर मैं भाग सकता था, लेकिन भारतीय संस्कृति में महिलाओं पर हमला करना पाप है। 


31 जुलाई 1940 को पेंटविले जेल में ऊधम सिंह को फाँसी पर चढ़ा दिया गया जिसे उन्होंने हँसते-हँसते स्वीकार कर लिया। ऊधम सिंह ने अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर दुनिया को संदेश दिया कि अत्याचारियों को भारतीय वीर कभी बख्शा नहीं करते। 


31 जुलाई 1974 को ब्रिटेन ने ऊधम सिंह के अवशेष भारत को सौंप दिए। ओडवायर को जहाँ ऊधम सिंह ने गोली से उड़ा दिया वहीं जनरल डायर कई तरह की बीमारियों से घिर कर तड़प तड़प कर बुरी मौत मारा गया।


🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹

Sunday, 7 July 2024

द्रौपदी मुरूमु भारत गणराज्य की राष्ट्रपति .

  ✍🏻 कहानी - सत्य घटना पर आधारित ..❗

महोदया, आप 'मेकअप' क्यों नहीं करती ..

अध्यापिका सुश्री रानी सोयामोई .. कॉलेज के छात्रों से बातचीत करती हैं।


उन्होंने कलाई घड़ी के अलावा कोई आभूषण नहीं पहना था।

सबसे ज्यादा छात्रों को आश्चर्य हुआ कि उन्होंने 'फेस पाउडर' का भी इस्तेमाल नहीं किया।


भाषण अंग्रेजी में था। उन्होंने केवल एक या दो मिनट ही बोला, लेकिन उनके शब्द दृढ़ संकल्प से भरे थे।


फिर बच्चों ने उन से कुछ प्रश्न पूछे।


प्रश्न: आपका नाम क्या है ..❓


मेरा नाम रानी है, सोयामोई मेरा पारिवारिक नाम है। मैं ओडिशा की मूल निवासी हूँ ..

...और कुछ पूछना है ..❓


दर्शकों में से एक दुबली-पतली लड़की खड़ी हुई।


"पूछो, बच्चे..."


"महोदया, आप मेकअप क्यों नहीं करतीं ..❓"


अध्यापक का चेहरा अचानक पीला पड़ गया। उनके पतले माथे पर पसीना आ गया। उनके चेहरे की मुस्कान फीकी पड़ गई। दर्शक अचानक चुप हो गए।


उन्होंने टेबल पर रखी पानी की बोतल खोली और थोड़ा पानी पिया।  फिर उसने धीरे से छात्र को बैठने का इशारा किया। 

फिर वह धीरे से बोलने लगी।


"तुमने एक परेशान करने वाला प्रश्न पूछा है। यह ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर एक शब्द में नहीं दिया जा सकता। मुझे उत्तर में तुम्हें अपनी जीवन कहानी सुनानी है। मुझे बताओ कि क्या तुम मेरी कहानी के लिए अपने कीमती दस मिनट निकालने को तैयार हो?"


"तैयार..."


मेरा जन्म ओडिशा के एक आदिवासी इलाके में हुआ था। कलेक्टर ने रुककर दर्शकों की ओर देखा।


"मेरा जन्म कोडरमा जिले के आदिवासी इलाके में एक छोटी सी झोपड़ी में हुआ था, जो _'मीका'_ खदानों से भरा हुआ था।


मेरे पिता और माता खनिक थे। मेरे दो बड़े भाई और एक छोटी बहन थी। हम एक छोटी सी झोपड़ी में रहते थे जिसमें बारिश होने पर पानी टपकता था।

     मेरे माता-पिता कम वेतन पर खदानों में काम करते थे क्योंकि उन्हें कोई और काम नहीं मिल पाया था। यह बहुत गंदा काम था।


जब मैं चार वर्ष की थी, तब मेरे पिता, माता और दो भाई कई बीमारियों के कारण बिस्तर पर पड़े थे।


उस समय उन्हें यह नहीं पता था कि यह बीमारी खदानों में मौजूद घातक 'मीका धूल' को अंदर लेने से होती है।

   जब मैं पाँच वर्ष की थी, मेरे भाई बीमारी से मर गए।"


एक छोटी सी आह भरकर कलेक्टर ने बोलना बंद कर दिया और अपने रूमाल से अपनी आँखें पोंछ लीं।


     "ज़्यादातर दिनों में हमारा भोजन सादा पानी और एक या दो रोटियाँ हुआ करता था। मेरे दोनों भाई गंभीर बीमारी और भूख के कारण इस दुनिया से चले गए। मेरे गाँव में, चिकित्सक तो छोड़िए, पाठशाला भी नहीं था। क्या आप ऐसे गाँव की कल्पना कर सकते हैं जहाँ पाठशाला, चिकित्सालय या शौचालय न हो, बिजली न हो?


एक दिन मेरे पिता ने मेरा भूखा, चमड़ी और हड्डियों से लथपथ हाथ पकड़ा और मुझे टिन की चादरों से ढकी एक बड़ी खदान में ले गए।

       यह एक अभ्रक की खदान थी जिसने समय के साथ बदनामी हासिल कर ली थी।


यह एक पुरानी खदान थी जिसे खोदा गया और खोदा गया, जो अंतहीन रूप से पाताल में फैली हुई थी। मेरा काम नीचे की छोटी-छोटी गुफाओं में रेंगना और अभ्रक अयस्क इकट्ठा करना था। यह केवल दस वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए ही संभव था।


अपने जीवन में पहली बार, मैंने पेट भर रोटियाँ खाईं। लेकिन उस दिन मुझे उल्टी हो गई।


 जिस समय मुझे प्रथम श्रेणी में होना चाहिए था, मैं अंधेरे कमरों में अभ्रक इकट्ठा कर रही थी, जहाँ मैं ‘जहरीली धूल’ में साँस ले रहा थी।


कभी-कभार ‘भूस्खलन’ में दुर्भाग्यपूर्ण बच्चों का मर जाना असामान्य नहीं था। और कभी-कभी कुछ ‘घातक बीमारियों’ से भी मर जाते थे


दिन में आठ घंटे काम करने के बाद, आप कम से कम एक बार के भोजन के लिए कमा पाते थे। मैं भूख और हर दिन जहरीली गैसों के साँस लेने के कारण दुबली और निर्जलित हो गई थी।


एक वर्ष बाद मेरी बहन भी खदान में काम करने लगी। जैसे ही वे (पिता) थोड़े ठीक हुए, ऐसा समय आया कि मेरे पिता, माँ, बहन और मैं एक साथ काम करते थे और हम बिना भूख के रह सकते थे।


लेकिन किस्मत ने हमें दूसरे रूप में परेशान करना शुरू कर दिया था। एक दिन जब मैं तेज बुखार के कारण काम पर नहीं जा रही थी, अचानक बारिश हुई। खदान के नीचे काम करने वाले श्रमिकों पर खदान गिरने से सैकड़ों लोग मारे गए। उनमें मेरे पिता, माँ और बहन भी थे।"


        रानी की दोनों आँखों से आँसू बहने लगे। दर्शकों में हर कोई साँस लेना भी भूल गया। कई लोगों की आँखें आँसुओं से भर गईं।


      "आपको याद रखना होगा कि मैं सिर्फ़ छह वर्ष की थी।

आखिरकार मैं सरकारी अगाती मंदिर पहुँची। वहाँ मेरी शिक्षा हुई। मैंने अपने गाँव से ही अपनी पहली अक्षर-पद्धति सीखी थी। आखिरकार यहाँ अध्यापक आपके सामने हैं।


आप सोच रहे होंगे कि इसका और इस बात का क्या संबंध है ? कि मैं मेकअप का इस्तेमाल नहीं करती।"


उसने दर्शकों की तरफ देखते हुए कहा।


"अपनी शिक्षा के दौरान ही मुझे एहसास हुआ कि उन दिनों अँधेरे में रेंगते हुए मैंने जो सारा अभ्रक इकट्ठा किया था, उसका इस्तेमाल मेकअप उत्पादों में किया जा रहा था।

   अभ्रक पहला प्रकार का मोती जैसा सिलिकेट खनिज है।

        कई बड़ी कॉस्मेटिक कंपनियों द्वारा पेश किए जाने वाले खनिज मेकअप में, आपकी त्वचा के लिए सबसे चमकीला रंग बहुरंगी अभ्रक से आता है, जिसे २०,००० छोटे बच्चे अपनी जान जोखिम में डालकर निकालते हैं।


गुलाब की कोमलता उनके जले हुए सपनों, उनके बिखरते जीवन और चट्टानों के बीच कुचले गए उनके मांस और खून के साथ आपके गालों पर फैलती है।

      खदानों से बच्चों के हाथों से उठाए गए लाखों डॉलर के अभ्रक का इस्तेमाल आज भी किया जाता है। हमारी सुंदरता को बढ़ाने के लिए।"


अब आप ही बताइए।

मैं अपने चेहरे पर मेकअप कैसे लगाऊं? मैं अपने भाइयों की याद में पेट भरकर कैसे खाऊं जो भूख से मर गए? मैं अपनी माँ की याद में महंगे रेशमी कपड़े कैसे पहनूं जिन्होंने कभी फटे कपड़ों के बारे में सपने में भी नहीं सोचा था ..❓"


     जब रानी चली गईं तो पूरा दर्शक अनजाने में ही खड़ा हो गया, उनके होठों पर हल्की मुस्कान थी, आँखों में आँसू पोंछे बिना, उनका सिर ऊँचा था।


(ओडिशा में अभी भी उच्चतम गुणवत्ता वाला अभ्रक खनन किया जाता है। २०,००० से अधिक छोटे बच्चे स्कूल जाने के बिना वहां काम करते हैं। वे मर जाते हैं, कुछ भूस्खलन में और कुछ बीमारी से...)


👉🏻 कई वर्ष बाद ..

वह महिला, भारत गणराज्य की पहली नागरिक बनीं

महामहिम

द्रौपदी  मुरूमु

भारत गणराज्य की राष्ट्रपति ..❗




देवरहा बाबा

   देवरहा बाबा 

〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

देवरहा बाबा भारत के उत्तर प्रदेश के देवरिया जनपद में एक योगी, सिद्ध महापुरुष एवं सन्तपुरुष थे...


डॉ॰ राजेन्द्र प्रसाद, महामना मदन मोहन मालवीय, पुरुषोत्तम दास टंडन, जैसी विभूतियों ने पूज्य देवरहा बाबा के समय- समय पर दर्शन कर अपने को कृतार्थ अनुभव किया था। 


पूज्य महर्षि पातंजलि द्वारा प्रतिपादित अष्टांग योग में पारंगत थे।


देवरहा बाबा का जन्म अज्ञात है। यहाँ तक कि उनकी सही उम्र का आकलन भी नहीं है। वह यूपी के *नाथ* नदौली ग्राम, लार रोड, देवरिया जिले के रहने वाले थे।


मंगलवार, 19 जून सन् 1990 को योगिनी एकादशी के दिन अपना प्राण त्यागने वाले इस बाबा के जन्म के बारे में संशय है। कहा जाता है कि वह करीब 900 साल तक जिन्दा थे। बाबा के संपूर्ण जीवन के बारे में अलग-अलग मत है, कुछ लोग उनका जीवन 250 साल तो कुछ लोग 500 साल मानते हैं। कुंभ कैंपस में संगम तट पर धूनी रमाए बाबा की करीब 10 सालों तक सेवा करने वाले मार्कण्डेय महराज के मुताबिक, पूरे जीवन निर्वस्त्र रहने वाले बाबा धरती से 12 फुट उंचे लकड़ी से बने बॉक्स में रहते थे। वह नीचे केवल सुबह के समय स्नान करने के लिए आते थे। इनके भक्त पूरी दुनिया में फैले हैं। राजनेता, फिल्मी सितारे और बड़े-बड़े अधिकारी उनके शरण में रहते थे।


हिमालय में अनेक वर्षों तक अज्ञात रूप में रहकर उन्होंने साधना की। वहां से वे पूर्वी उत्तर प्रदेश के देवरिया नामक स्थान पर पहुंचे। वहां वर्षों निवास करने के कारण उनका नाम *देवरहा बाबा* पड़ा। देवरहा बाबा ने देवरिया जनपद के सलेमपुर तहसील में मइल (एक छोटा शहर) से लगभग एक कोस की दूरी पर सरयू नदी के किनारे एक मचान पर अपना डेरा डाल दिया और धर्म-कर्म करने लगे।


देवरहा बाबा परंम् रामभक्त थे, देवरहा बाबा के मुख में सदा राम नाम का वास था, वो भक्तो को राम मंत्र की दीक्षा दिया करते थे। वो सदा सरयू के किनारे रहा करते थे।


उनका कहना था  "एक लकड़ी ह्रदय को

मानो दूसर राम नाम पहिचानो

राम नाम नित उर पे मारो

ब्रह्म दिखे संशय न जानो"


देवरहा बाबा जनसेवा तथा गोसेवा को सर्वोपरि-धर्म मानते थे तथा प्रत्येक दर्शनार्थी को लोगों की सेवा, गोमाता की रक्षा करने तथा भगवान की भक्ति में रत रहने की प्रेरणा देते थे। देवरहा बाबा श्री राम और श्री कृष्ण को एक मानते थे और भक्तो को कष्ट से मुक्ति के लिए कृष्ण मंत्र भी देते थे।


"ऊं कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने

प्रणत: क्लेश नाशाय, गोविन्दाय नमो-नम:"


बाबा कहते थे जीवन को पवित्र बनाए बिना, ईमानदारी, सात्विकता-सरसता के बिना भगवान की कृपा प्राप्त नहीं होती। अत: सबसे पहले अपने जीवन को शुद्ध-पवित्र बनाने का संकल्प लो वे प्राय: गंगा या यमुना तट पर बनी घास-फूस की मचान पर रहकर साधना किया करते थे। दर्शनार्थ आने वाले भक्तजनों को वे सद्मार्ग पर चलते हुए अपना मानव जीवन सफल करने का आशीर्वाद देते थे। 


वे कहते इस भारत भूमि की दिव्यता का यह प्रमाण है कि इसमें भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण ने अवतार लिया है। यह देवभूमि है, इसकी सेवा, रक्षा तथा संवर्धन करना प्रत्येक भारतवासी का कर्तव्य है


प्रयागराज में सन् 1989 में महाकुंभ के पावन पर्व पर विश्व हिन्दू परिषद् के मंच से बाबा ने अपना पावन संदेश देते हुए कहा था दिव्यभूमि भारत की समृद्धि गोरक्षा, गोसेवा के बिना संभव नहीं होगी। गोहत्या का कलंक मिटाना अत्यावश्यक है।


पूज्य बाबा ने योग विद्या के जिज्ञासुओं को हठयोग की दसों मुद्राओं का प्रशिक्षण दिया। वे ध्यान योग, नाद योग, लय योग, प्राणायाम, त्राटक, ध्यान, धारणा, समाधि आदि की साधन पद्धतियों का जब विवेचन करते तो बड़े-बड़े धर्माचार्य उनके योग सम्बंधी ज्ञान के समक्ष नतमस्तक हो जाते थे।


बाबा ने भगवान श्रीकृष्ण की लीला भूमि वृन्दावन में यमुना तट पर स्थित मचान पर चार वर्ष तक साधना की बहुत ही कम समय में देवरहा बाबा अपने कर्म एवं व्यक्तित्व से एक सिद्ध महापुरुष के रूप में प्रसिद्ध हो गए। बाबा के दर्शन के लिए प्रतिदिन विशाल जन समूह उमड़ने लगा तथा बाबा के सानिध्य में शांति और आनन्द पाने लगा। बाबा श्रद्धालुओं को योग और साधना के साथ-साथ ज्ञान की बातें बताने लगे। बाबा का जीवन सादा और एकदम संन्यासी था। बाबा भोर में ही स्नान आदि से निवृत्त होकर ईश्वर ध्यान में लीन हो जाते थे और मचान पर आसीन होकर श्रद्धालुओं को दर्शन देते और ज्ञान लाभ कराते थे। कुंभ मेले के दौरान बाबा अलग-अलग जगहों पर प्रवास किया करते थे। गंगा-यमुना के तट पर उनका मंच लगता था। वह 1-1 महीने दोनों के किनारे रहते थे। जमीन से कई फीट ऊंचे स्थान पर बैठकर वह लोगों को आशीर्वाद दिया करते थे। बाबा सभी के मन की बातें जान लेते थे। उन्होंने पूरे जीवन कुछ नहीं खाया। सिर्फ दूध और शहद पीकर जीते थे। श्रीफल का रस उन्हें बहुत पसंद था।


देवराहा बाबा के भक्तों में कई बड़े लोगों का नाम शुमार है। राजेंद्र प्रसाद, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी, लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव और कमलापति त्रिपाठी जैसे राजनेता हर समस्या के समाधान के लिए बाबा की शरण में आते थे। देश में आपातकाल के बाद हुए चुनावों में जब इंदिरा गाँधी हार गईं तो वह भी देवराहा बाबा से आशीर्वाद लेने गयीं।


सन् 1990 की योगिनी एकादशी (19 जून) के पावन दिन उन्होंने निर्वाण प्राप्त किया।

〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️




Saturday, 6 July 2024

स्वामी विवेकानन्द पुण्य दिवस विशेष

  स्वामी विवेकानन्द पुण्य दिवस विशेष



〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️

स्वामी विवेकानन्द का जन्म 12 जनवरी सन् 1863 (विद्वानों के अनुसार मकर संक्रान्ति संवत् 1920) को कलकत्ता में एक कायस्थ परिवार में हुआ था। उनके बचपन का नाम नरेन्द्रनाथ दत्त था। पिता विश्वनाथ दत्त कलकत्ता हाईकोर्ट के एक प्रसिद्ध वकील थे। दुर्गाचरण दत्ता, (नरेंद्र के दादा) संस्कृत और फारसी के विद्वान थे उन्होंने अपने परिवार को 25 की उम्र में छोड़ दिया और एक साधु बन गए। उनकी माता भुवनेश्वरी देवी धार्मिक विचारों की महिला थीं। उनका अधिकांश समय भगवान शिव की पूजा-अर्चना में व्यतीत होता था। नरेंद्र के पिता और उनकी माँ के धार्मिक, प्रगतिशील व तर्कसंगत रवैया ने उनकी सोच और व्यक्तित्व को आकार देने में मदद की


कलकत्ता के एक कुलीन बंगाली परिवार में जन्मे विवेकानंद आध्यात्मिकता की ओर झुके हुए थे। वे अपने गुरु रामकृष्ण देव से काफी प्रभावित थे जिनसे उन्होंने सीखा कि सारे जीव स्वयं परमात्मा का ही एक अवतार हैं; इसलिए मानव जाति की सेवा द्वारा परमात्मा की भी सेवा की जा सकती है। रामकृष्ण की मृत्यु के बाद विवेकानंद ने बड़े पैमाने पर भारतीय उपमहाद्वीप का दौरा किया और ब्रिटिश भारत में मौजूदा स्थितियों का पहले हाथ ज्ञान हासिल किया। बाद में विश्व धर्म संसद 1893 में भारत का प्रतिनिधित्व करने, संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए कूच की। विवेकानंद के संयुक्त राज्य अमेरिका, इंग्लैंड और यूरोप में हिंदू दर्शन के सिद्धांतों का प्रसार किया , सैकड़ों सार्वजनिक और निजी व्याख्यानों का आयोजन किया। भारत में, विवेकानंद को एक देशभक्त संत के रूप में माना जाता है और इनके जन्मदिन को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है।


बचपन से ही नरेन्द्र अत्यन्त कुशाग्र बुद्धि के तो थे ही नटखट भी थे। अपने साथी बच्चों के साथ वे खूब शरारत करते और मौका मिलने पर अपने अध्यापकों के साथ भी शरारत करने से नहीं चूकते थे। उनके घर में नियमपूर्वक रोज पूजा-पाठहोता था धार्मिक प्रवृत्ति की होने के कारण माता भुवनेश्वरी देवी को पुराण, रामायण,  महाभारत आदि की कथा सुनने का बहुत शौक था। कथावाचक बराबर इनके घर आते रहते थे। नियमित रूप से भजन-कीर्तन भी होता रहता था। परिवार के धार्मिक एवं आध्यात्मिक वातावरण के प्रभाव से बालक नरेन्द्र के मन में बचपन से ही धर्म एवं अध्यात्म के संस्कार गहरे होते गये। माता-पिता के संस्कारों और धार्मिक वातावरण के कारण बालक के मन में बचपन से ही ईश्वर को जानने और उसे प्राप्त करने की लालसा दिखायी देने लगी थी। ईश्वर के बारे में जानने की उत्सुकता में कभी-कभी वे ऐसे प्रश्न पूछ बैठते थे कि इनके माता-पिता और कथावाचक पण्डितजी तक चक्कर में पड़ जाते थे


शिक्षा

〰️〰️

सन् 1871 में, आठ साल की उम्र में, नरेंद्रनाथ ने ईश्वर चंद्र विद्यासागर के मेट्रोपोलिटन संस्थान में दाखिला लिया जहाँ वे स्कूल गए। 1877 में उनका परिवार रायपुर चला गया। 1879 में, कलकत्ता में अपने परिवार की वापसी के बाद, वह एकमात्र छात्र थे जिन्होंने प्रेसीडेंसी कॉलेज प्रवेश परीक्षा में प्रथम डिवीजन अंक प्राप्त किये।

वे दर्शन, धर्म, इतिहास, सामाजिक विज्ञान, कला और साहित्य सहित विषयों के एक उत्साही पाठक थे। इनकी  वेद,  उपनिषद, भगवद् गीता,  रामायण,  महाभारत और पुराणोंके अतिरिक्त अनेक हिन्दू शास्त्रों में गहन रूचि थी। नरेंद्र को भारतीय शास्त्रीय संगीत में प्रशिक्षित किया गया था,और ये नियमित रूप से शारीरिक व्यायाम में व खेलों में भाग लिया करते थे। नरेंद्र ने पश्चिमी तर्क, पश्चिमी दर्शन और यूरोपीय इतिहास का अध्ययन जनरल असेंबली इंस्टिटूशन (अब स्कॉटिश चर्च कॉलेज) में किया। 1881 में इन्होंने ललित कला की परीक्षा उत्तीर्ण की, और 1884 में कला स्नातक की डिग्री पूरी कर ली।

नरेंद्र ने डेविड ह्यूम, इमैनुएल कांट, जोहान गोटलिब फिच, बारूक स्पिनोज़ा, जोर्ज डब्लू एच हेजेल, आर्थर स्कूपइन्हार , ऑगस्ट कॉम्टे, जॉन स्टुअर्ट मिल और चार्ल्स डार्विन के कामों का अध्ययन किया। उन्होंने स्पेंसर की किताब एजुकेशन (1860) का बंगाली में अनुवाद किया। ये हर्बर्ट स्पेंसर के विकासवाद से काफी मोहित थे। पश्चिम दार्शनिकों के अध्यन के साथ ही इन्होंने संस्कृत ग्रंथों और बंगाली साहित्य को भी सीखा।विलियम हेस्टी (महासभा संस्था के प्रिंसिपल) ने लिखा, "नरेंद्र वास्तव में एक जीनियस है। मैंने काफी विस्तृत और बड़े इलाकों में यात्रा की है लेकिन उनकी जैसी प्रतिभा वाला का एक भी बालक कहीं नहीं देखा यहाँ तक की जर्मन विश्वविद्यालयों के दार्शनिक छात्रों में भी नहीं।" अनेक बार इन्हें श्रुतिधर( विलक्षण स्मृति वाला एक व्यक्ति) भी कहा गया है।


गुरु के प्रति अकाट्य श्रद्धा

〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️

एक बार किसी शिष्य ने गुरुदेव की सेवा में घृणा और निष्क्रियता दिखाते हुए नाक-भौं सिकोड़ीं। यह देखकर विवेकानन्द को क्रोध आ गया। वे अपने उस गुरु भाई को सेवा का पाठ पढ़ाते और गुरुदेव की प्रत्येक वस्तु के प्रति प्रेम दर्शाते हुए उनके बिस्तर के पास रक्त, कफ आदि से भरी थूकदानी उठाकर फेंकते थे। गुरु के प्रति ऐसी अनन्य भक्ति और निष्ठा के प्रताप से ही वे अपने गुरु के शरीर और उनके दिव्यतम आदर्शों की उत्तम सेवा कर सके। गुरुदेव को समझ सके और स्वयं के अस्तित्व को गुरुदेव के स्वरूप में विलीन कर सके। और आगे चलकर समग्र विश्व में भारत के अमूल्य आध्यात्मिक भण्डार की महक फैला सके। ऐसी थी उनके इस महान व्यक्तित्व की नींव में गुरुभक्ति, गुरुसेवा और गुरु के प्रति अनन्य निष्ठा जिसका परिणाम सारे संसार ने देखा। स्वामी विवेकानन्द अपना जीवन अपने गुरुदेव रामकृष्ण परमहंस को समर्पित कर चुके थे। उनके गुरुदेव का शरीर अत्यन्त रुग्ण हो गया था। गुरुदेव के शरीर-त्याग के दिनों में अपने घर और कुटुम्ब की नाजुक हालत व स्वयं के भोजन की चिन्ता किये बिना वे गुरु की सेवा में सतत संलग्न रहे।

विवेकानन्द बड़े स्‍वप्न‍दृष्‍टा थे। उन्‍होंने एक ऐसे समाज की कल्‍पना की थी जिसमें धर्म या जाति के आधार पर मनुष्‍य-मनुष्‍य में कोई भेद न रहे। उन्‍होंने वेदान्त के सिद्धान्तों को इसी रूप में रखा। अध्‍यात्‍मवाद बनाम भौतिकवाद के विवाद में पड़े बिना भी यह कहा जा सकता है कि समता के सिद्धान्त का जो आधार विवेकानन्‍द ने दिया उससे सबल बौद्धिक आधार शायद ही ढूँढा जा सके। विवेकानन्‍द को युवकों से बड़ी आशाएँ थीं। आज के युवकों के लिये इस ओजस्‍वी सन्‍यासी का जीवन एक आदर्श है। उनके नाना जी का नाम श्री नंदलाल बसु था।


आध्यात्मिक जीवन मे प्रवेश

〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️

1880 में नरेंद्र, ईसाई से हिन्दू धर्म में रामकृष्ण के प्रभाव से परिवर्तित केशव चंद्र सेन की नव विधान में शामिल हुए, नरेंद्र 1884 से पहले कुछ बिंदु पर, एक फ्री मसोनरी लॉज और साधारण ब्रह्म समाज जो ब्रह्म समाज का ही एक अलग गुट था और जो केशव चंद्र सेन और देवेंद्रनाथ टैगोर के नेतृत्व में था। 1881-1884 के दौरान ये सेन्स बैंड ऑफ़ होप में भी सक्रीय रहे जो धूम्रपान और शराब पीने से युवाओं को हतोत्साहित करता था।

यह नरेंद्र के परिवेश के कारण पश्चिमी आध्यात्मिकता के साथ परिचित हो गया था। उनके प्रारंभिक विश्वासों को ब्रह्म समाज ने जो एक निराकार ईश्वर में विश्वास और मूर्ति पूजा का प्रतिवाद करता था, ने प्रभावित किया और सुव्यवस्थित, युक्तिसंगत, अद्वैतवादी अवधारणाओं , धर्मशास्त्र ,वेदांत और उपनिषदों के एक चयनात्मक और आधुनिक ढंग से अध्यन पर प्रोत्साहित किया।


शिकागो में दिए प्रभावशाली भाषण के कुछ अंश

〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️

मेरे अमरीकी भाइयो और बहनो!

आपने जिस सौहार्द और स्नेह के साथ हम लोगों का स्वागत किया हैं उसके प्रति आभार प्रकट करने के निमित्त खड़े होते समय मेरा हृदय अवर्णनीय हर्ष से पूर्ण हो रहा हैं। संसार में संन्यासियों की सबसे प्राचीन परम्परा की ओर से मैं आपको धन्यवाद देता हूँ; धर्मों की माता की ओर से धन्यवाद देता हूँ; और सभी सम्प्रदायों एवं मतों के कोटि कोटि हिन्दुओं की ओर से भी धन्यवाद देता हूँ।

मैं इस मंच पर से बोलने वाले उन कतिपय वक्ताओं के प्रति भी धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ जिन्होंने प्राची के प्रतिनिधियों का उल्लेख करते समय आपको यह बतलाया है कि सुदूर देशों के ये लोग सहिष्णुता का भाव विविध देशों में प्रचारित करने के गौरव का दावा कर सकते हैं। मैं एक ऐसे धर्म का अनुयायी होने में गर्व का अनुभव करता हूँ जिसने संसार को सहिष्णुता तथा सार्वभौम स्वीकृत- दोनों की ही शिक्षा दी हैं। हम लोग सब धर्मों के प्रति केवल सहिष्णुता में ही विश्वास नहीं करते वरन समस्त धर्मों को सच्चा मान कर स्वीकार करते हैं। मुझे ऐसे देश का व्यक्ति होने का अभिमान है जिसने इस पृथ्वी के समस्त धर्मों और देशों के उत्पीड़ितों और शरणार्थियों को आश्रय दिया है। मुझे आपको यह बतलाते हुए गर्व होता हैं कि हमने अपने वक्ष में उन यहूदियों के विशुद्धतम अवशिष्ट को स्थान दिया था जिन्होंने दक्षिण भारत आकर उसी वर्ष शरण ली थी जिस वर्ष उनका पवित्र मन्दिर रोमन जाति के अत्याचार से धूल में मिला दिया गया था। ऐसे धर्म का अनुयायी होने में मैं गर्व का अनुभव करता हूँ जिसने महान जरथुष्ट जाति के अवशिष्ट अंश को शरण दी और जिसका पालन वह अब तक कर रहा है। भाईयो मैं आप लोगों को एक स्तोत्र की कुछ पंक्तियाँ सुनाता हूँ जिसकी आवृति मैं बचपन से कर रहा हूँ और जिसकी आवृति प्रतिदिन लाखों मनुष्य किया करते हैं:


रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिलनानापथजुषाम्। नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव॥


अर्थात जैसे विभिन्न नदियाँ भिन्न भिन्न स्रोतों से निकलकर समुद्र में मिल जाती हैं उसी प्रकार हे प्रभो! भिन्न भिन्न रुचि के अनुसार विभिन्न टेढ़े-मेढ़े अथवा सीधे रास्ते से जानेवाले लोग अन्त में तुझमें ही आकर मिल जाते हैं।

यह सभा, जो अभी तक आयोजित सर्वश्रेष्ठ पवित्र सम्मेलनों में से एक है स्वतः ही गीता के इस अद्भुत उपदेश का प्रतिपादन एवं जगत के प्रति उसकी घोषणा करती है:


ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्। मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥


अर्थात जो कोई मेरी ओर आता है-चाहे किसी प्रकार से हो-मैं उसको प्राप्त होता हूँ। लोग भिन्न मार्ग द्वारा प्रयत्न करते हुए अन्त में मेरी ही ओर आते हैं।

साम्प्रदायिकता, हठधर्मिता और उनकी वीभत्स वंशधर धर्मान्धता इस सुन्दर पृथ्वी पर बहुत समय तक राज्य कर चुकी हैं। वे पृथ्वी को हिंसा से भरती रही हैं व उसको बारम्बार मानवता के रक्त से नहलाती रही हैं, सभ्यताओं को ध्वस्त करती हुई पूरे के पूरे देशों को निराशा के गर्त में डालती रही हैं। यदि ये वीभत्स दानवी शक्तियाँ न होतीं तो मानव समाज आज की अवस्था से कहीं अधिक उन्नत हो गया होता। पर अब उनका समय आ गया हैं और मैं आन्तरिक रूप से आशा करता हूँ कि आज सुबह इस सभा के सम्मान में जो घण्टा ध्वनि हुई है वह समस्त धर्मान्धता का, तलवार या लेखनी के द्वारा होनेवाले सभी उत्पीड़नों का तथा एक ही लक्ष्य की ओर अग्रसर होने वाले मानवों की पारस्पारिक कटुता का मृत्यु निनाद सिद्ध हो।


भारतीय जनमानस के लिए विवेकानन्द का योगदान

〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️

मुम्बई में गेटवे ऑफ़ इन्डिया के निकट स्थित स्वामी विवेकानन्द की प्रतिमूर्ति


उन्तालीस वर्ष के संक्षिप्त जीवनकाल में स्वामी विवेकानन्द जो काम कर गये वे आने वाली अनेक शताब्दियों तक पीढ़ियों का मार्गदर्शन करते रहेंगे।

तीस वर्ष की आयु में स्वामी विवेकानन्द ने शिकागो, अमेरिका के विश्व धर्म सम्मेलन में हिंदू धर्म का प्रतिनिधित्व किया और उसे सार्वभौमिक पहचान दिलवायी। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने एक बार कहा था-"यदि आप भारत को जानना चाहते हैं तो विवेकानन्द को पढ़िये। उनमें आप सब कुछ सकारात्मक ही पायेंगे, नकारात्मक कुछ भी नहीं।"

रोमां रोलां ने उनके बारे में कहा था-"उनके द्वितीय होने की कल्पना करना भी असम्भव है, वे जहाँ भी गये, सर्वप्रथम ही रहे। हर कोई उनमें अपने नेता का दिग्दर्शन करता था। वे ईश्वर के प्रतिनिधि थे और सब पर प्रभुत्व प्राप्त कर लेना ही उनकी विशिष्टता थी। हिमालय प्रदेश में एक बार एक अनजान यात्री उन्हें देख ठिठक कर रुक गया और आश्चर्यपूर्वक चिल्ला उठा-‘शिव!’ यह ऐसा हुआ मानो उस व्यक्ति के आराध्य देव ने अपना नाम उनके माथे पर लिख दिया हो।"

वे केवल सन्त ही नहीं, एक महान देशभक्त, वक्ता, विचारक, लेखक और मानव-प्रेमी भी थे। अमेरिका से लौटकर उन्होंने देशवासियों का आह्वान करते हुए कहा था-"नया भारत निकल पड़े मोची की दुकान से, भड़भूँजे के भाड़ से, कारखाने से, हाट से, बाजार से; निकल पडे झाड़ियों, जंगलों, पहाड़ों, पर्वतों से।" और जनता ने स्वामीजी की पुकार का उत्तर दिया। वह गर्व के साथ निकल पड़ी। गान्धीजी को आजादी की लड़ाई में जो जन-समर्थन मिला, वह विवेकानन्द के आह्वान का ही फल था। इस प्रकार वे भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के भी एक प्रमुख प्रेरणा के स्रोत बने। उनका विश्वास था कि पवित्र भारतवर्ष धर्म एवं दर्शन की पुण्यभूमि है। यहीं बड़े-बड़े महात्माओं व ऋषियों का जन्म हुआ, यही संन्यास एवं त्याग की भूमि है तथा यहीं-केवल यहीं-आदिकाल से लेकर आज तक मनुष्य के लिये जीवन के सर्वोच्च आदर्श एवं मुक्ति का द्वार खुला हुआ है। उनके कथन-"‘उठो, जागो, स्वयं जागकर औरों को जगाओ। अपने नर-जन्म को सफल करो और तब तक नहीं रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाये।"


उन्नीसवीं सदी के आखिरी वर्षोँ में विवेकानन्द लगभग सशस्त्र या हिंसक क्रान्ति के जरिये भी देश को आजाद करना चाहते थे। परन्तु उन्हें जल्द ही यह विश्वास हो गया था कि परिस्थितियाँ उन इरादों के लिये अभी परिपक्व नहीं हैं। इसके बाद ही विवेकानन्द ने ‘एकला चलो‘ की नीति का पालन करते हुए एक परिव्राजक के रूप में भारत और दुनिया को खंगाल डाला।

उन्होंने कहा था कि मुझे बहुत से युवा संन्यासी चाहिये जो भारत के ग्रामों में फैलकर देशवासियों की सेवा में खप जायें। उनका यह सपना पूरा नहीं हुआ। विवेकानन्द पुरोहितवाद, धार्मिक आडम्बरों, कठमुल्लापन और रूढ़ियों के सख्त खिलाफ थे। उन्होंने धर्म को मनुष्य की सेवा के केन्द्र में रखकर ही आध्यात्मिक चिंतन किया था। उनका हिन्दू धर्म अटपटा, लिजलिजा और वायवीय नहीं था। उन्होंने यह विद्रोही बयान दिया था कि इस देश के तैंतीस करोड़ भूखे, दरिद्र और कुपोषण के शिकार लोगों को देवी देवताओं की तरह मन्दिरों में स्थापित कर दिया जाये और मन्दिरों से देवी देवताओं की मूर्तियों को हटा दिया जाये।

उनका यह कालजयी आह्वान इक्कीसवीं सदी के पहले दशक के अन्त में एक बड़ा प्रश्नवाचक चिन्ह खड़ा करता है। उनके इस आह्वान को सुनकर पूरे पुरोहित वर्ग की घिग्घी बँध गई थी। आज कोई दूसरा साधु तो क्या सरकारी मशीनरी भी किसी अवैध मन्दिर की मूर्ति को हटाने का जोखिम नहीं उठा सकती। विवेकानन्द के जीवन की अन्तर्लय यही थी कि वे इस बात से आश्वस्त थे कि धरती की गोद में यदि ऐसा कोई देश है जिसने मनुष्य की हर तरह की बेहतरी के लिए ईमानदार कोशिशें की हैं, तो वह भारत ही है।

उन्होंने पुरोहितवाद, ब्राह्मणवाद, धार्मिक कर्मकाण्ड और रूढ़ियों की खिल्ली भी उड़ायी और लगभग आक्रमणकारी भाषा में ऐसी विसंगतियों के खिलाफ युद्ध भी किया। उनकी दृष्टि में हिन्दू धर्म के सर्वश्रेष्ठ चिन्तकों के विचारों का निचोड़ पूरी दुनिया के लिए अब भी ईर्ष्या का विषय है। स्वामीजी ने संकेत दिया था कि विदेशों में भौतिक समृद्धि तो है और उसकी भारत को जरूरत भी है लेकिन हमें याचक नहीं बनना चाहिये। हमारे पास उससे ज्यादा बहुत कुछ है जो हम पश्चिम को दे सकते हैं और पश्चिम को उसकी बेसाख्ता जरूरत है।

यह स्वामी विवेकानन्द का अपने देश की धरोहर के लिये दम्भ या बड़बोलापन नहीं था। यह एक वेदान्ती साधु की भारतीय सभ्यता और संस्कृति की तटस्थ, वस्तुपरक और मूल्यगत आलोचना थी। बीसवीं सदी के इतिहास ने बाद में उसी पर मुहर लगायी।


स्वामी विवेकानन्द के शिक्षा दर्शन के आधारभूत सिद्धान्त निम्नलिखित हैं।

〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️

1. शिक्षा ऐसी हो जिससे बालक का शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक विकास हो सके।

2. शिक्षा ऐसी हो जिससे बालक के चरित्र का निर्माण हो, मन का विकास हो, बुद्धि विकसित हो तथा बालक आत्मनिर्भन बने।

3. बालक एवं बालिकाओं दोनों को समान शिक्षा देनी चाहिए।

4. धार्मिक शिक्षा, पुस्तकों द्वारा न देकर आचरण एवं संस्कारों द्वारा देनी चाहिए।

5. पाठ्यक्रम में लौकिक एवं पारलौकिक दोनों प्रकार के विषयों को स्थान देना चाहिए।

6. शिक्षा, गुरू गृह में प्राप्त की जा सकती है।

7. शिक्षक एवं छात्र का सम्बन्ध अधिक से अधिक निकट का होना चाहिए।

8. सर्वसाधारण में शिक्षा का प्रचार एवं प्रसार किया जान चाहिये।

9. देश की आर्थिक प्रगति के लिए तकनीकी शिक्षा की व्यवस्था की जाय।

10. मानवीय एवं राष्ट्रीय शिक्षा परिवार से ही शुरू करनी चाहिए।


स्वामी विवेकानन्द के सुविचार

〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️

👉उठो, जागो और तब तक रुको नही जब तक मंजिल प्राप्त न हो जाये ।


👉जो सत्य है, उसे साहसपूर्वक निर्भीक होकर लोगों से कहो–उससे किसी को कष्ट होता है या नहीं, इस ओर ध्यान मत दो। दुर्बलता को कभी प्रश्रय मत दो। सत्य की ज्योति‘बुद्धिमान’ मनुष्यों के लिए यदि अत्यधिक मात्रा में प्रखर प्रतीत होती है, और उन्हें बहा ले जाती है, तो ले जाने दो–वे जितना शीघ्र बह जाएँ उतना अच्छा ही है।


👉तुम अपनी अंत:स्थ आत्मा को छोड़ किसी और के सामने सिर मत झुकाओ। जब तक तुम यह अनुभव नहीं करते कि तुम स्वयं देवों के देव हो, तब तक तुम मुक्त नहीं हो सकते।


ईश्वर ही ईश्वर की उपलब्थि कर सकता है। सभी जीवंत ईश्वर हैं–इस भाव से सब को देखो। मनुष्य का अध्ययन करो, मनुष्य ही जीवन्त काव्य है। जगत में जितने ईसा या बुद्ध हुए हैं, सभी हमारी ज्योति से ज्योतिष्मान हैं। इस ज्योति को छोड़ देने पर ये सब हमारे लिए और अधिक जीवित नहीं रह सकेंगे, मर जाएंगे। तुम अपनी आत्मा के ऊपर स्थिर रहो। 


👉ज्ञान स्वयमेव वर्तमान है, मनुष्य केवल उसका आविष्कार करता है।


👉मानव-देह ही सर्वश्रेष्ठ देह है, एवं मनुष्य ही सर्वोच्च प्राणी है, क्योंकि इस मानव-देह तथा इस जन्म में ही हम इस सापेक्षिक जगत् से संपूर्णतया बाहर हो सकते हैं–निश्चय ही मुक्ति की अवस्था प्राप्त कर सकते हैं, और यह मुक्ति ही हमारा चरम लक्ष्य है।


👉जो मनुष्य इसी जन्म में मुक्ति प्राप्त करना चाहता है, उसे एक ही जन्म में हजारों वर्ष का काम करना पड़ेगा। वह जिस युग में जन्मा है,उससे उसे बहुत आगे जाना पड़ेगा, किन्तु साधारण लोग किसी तरह रेंगते-रेंगते ही आगे बढ़ सकते हैं।


👉जो महापुरुष प्रचार-कार्य के लिए अपना जीवन समर्पित कर देते हैं, वे उन महापुरुषों की तुलना में अपेक्षाकृत अपूर्ण हैं, जो मौन रहकर पवित्र जीवनयापन करते हैं और श्रेष्ठ विचारों का चिन्तन करते हुए जगत् की सहायता करते हैं। इन सभी महापुरुषों में एक के बाद दूसरे का आविर्भाव होता है–अंत में उनकी शक्ति का चरम फलस्वरूप ऐसा कोई शक्तिसम्पन्न पुरुष आविर्भूत होता है, जो जगत् को शिक्षा प्रदान करता है।


👉आध्यात्मिक दृष्टि से विकसित हो चुकने पर धर्मसंघ में बना रहना अवांछनीय है। उससे बाहर निकलकर स्वाधीनता की मुक्त वायु में जीवन व्यतीत करो।


👉मुक्ति-लाभ के अतिरिक्त और कौन सी उच्चावस्था का लाभ किया जा सकता है?देवदूत कभी कोई बुरे कार्य नहीं करते,इसलिए उन्हें कभी दंड भी प्राप्त नहीं होता,अतएव वे मुक्त भी नहीं हो सकते। सांसारिक धक्का ही हमें जगा देता है, वही इस जगत्स्वप्न को भंग करने में सहायता पहुँचाता है। इस प्रकार के लगातार आघात ही इस संसार से छुटकारा पाने की अर्थात् मुक्ति-लाभ करने की हमारी आकांक्षा को जाग्रत करते हैं।


मृत्यु

〰️〰️

विवेकानंद ओजस्वी और सारगर्भित व्याख्यानों की प्रसिद्धि विश्व भर में है। जीवन के अन्तिम दिन उन्होंने शुक्ल यजुर्वेदकी व्याख्या की और कहा-"एक और विवेकानन्द चाहिये, यह समझने के लिये कि इस विवेकानन्द ने अब तक क्या किया है।" उनके शिष्यों के अनुसार जीवन के अन्तिम दिन 4 जुलाई 1902 को भी उन्होंने अपनी ध्यान करने की दिनचर्या को नहीं बदला और प्रात: दो तीन घण्टे ध्यान किया और ध्यानावस्था में ही अपने ब्रह्मरन्ध्र को भेदकर महासमाधि ले ली। बेलूर में गंगा तट पर चन्दन की चिता पर उनकी अंत्येष्टिकी गयी। इसी गंगा तट के दूसरी ओर उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस का सोलह वर्ष पूर्व अन्तिम संस्कार हुआ था। उनके शिष्यों और अनुयायियों ने उनकी स्मृति में वहाँ एक मन्दिर बनवाया और समूचे विश्व में विवेकानन्द तथा उनके गुरु रामकृष्ण के सन्देशों के प्रचार के लिये 130 से अधिक केन्द्रों की स्थापना की।

〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️



Tuesday, 2 July 2024

3 जुलाई/पुण्य-तिथि विरक्त सन्त स्वामी रामसुखदासजी

 3 जुलाई/पुण्य-तिथि


विरक्त सन्त स्वामी रामसुखदासजी


धर्मप्राण भारत में एक से बढ़कर एक विरक्त सन्त एवं महात्माओं ने जन्म लिया है। ऐसे ही सन्तों में शिरोमणि थे परम वीतरागी स्वामी रामसुखदेव जी महाराज। स्वामी जी के जन्म आदि की ठीक तिथि एवं स्थान का प्रायः पता नहीं लगता; क्योंकि इस बारे में उन्होंने पूछने पर भी कभी चर्चा नहीं की। फिर भी जिला बीकानेर (राजस्थान) के किसी गाँव में उनका जन्म 1902 ई. में हुआ था, ऐसा कहा जाता है।


उनका बचपन का नाम क्या था, यह भी लोगों को नहीं पता; पर इतना सत्य है कि बाल्यवस्था से ही साधु सन्तों के साथ बैठने में उन्हें बहुत सुख मिलता था। जिस अवस्था में अन्य बच्चे खेलकूद और खाने-पीने में लगे रहते थे, उस समय वे एकान्त में बैठकर साधना करना पसन्द करते थे। बीकानेर में ही उनका सम्पर्क श्री गम्भीरचन्द दुजारी से हुआ। दुजारी जी भाई हनुमानप्रसाद पोद्दार एवं सेठ जयदयाल गोयन्दका के आध्यात्मिक विचारों से बहुत प्रभावित थे। इस प्रकार रामसुखदास जी भी इन महानुभावों के सम्पर्क में आ गये।


जब इन महानुभावों ने गोरखपुर में ‘गीता प्रेस’ की स्थापना की, तो रामसुखदास जी भी उनके साथ इस काम में लग गये। धर्म एवं संस्कृति प्रधान पत्रिका ‘कल्याण’ का उन्होंने काफी समय तक सम्पादन भी किया। उनके इस प्रयास से ‘कल्याण’ ने विश्व भर के धर्मप्रेमियों में अपना स्थान बना लिया। इस दौरान स्वामी रामसुखदास जी ने अनेक आध्यात्मिक ग्रन्थों की रचना भी की। धीरे-धीरे पूरे भारत में उनका एक विशिष्ट स्थान बन गया।


आगे चलकर भक्तों के आग्रह पर स्वामी जी ने पूरे देश का भ्रमणकर गीता पर प्रवचन देने प्रारम्भ किये। वे अपने प्रवचनों में कहते थे कि भारत की पहचान गाय, गंगा, गीता, गोपाल तथा गायत्री से है। स्वाधीनता प्राप्ति के बाद जब-जब शासन ने हिन्दू कोड बिल और धर्मनिरपेक्षता की आड़ में हिन्दू धर्म  ।

Monday, 1 July 2024

*प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की नायिका आजादी की अमर शहीद वीरांगना ऊदादेवी पासी

 *प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की नायिका आजादी की अमर शहीद वीरांगना ऊदादेवी पासी* 

वीरांगना ऊदादेवी पासी स्व0 बाबू राम सहाय चौधरी पूर्व एम0 एल0 सी0 की परदादी अर्थात ग्रेट ग्रैन्ड मदर थी। उनके वंशज आज भी हुसैनगंज चौराहा, लखनऊ के पास निवास करते हैं।


बात भारतवर्ष में अंग्रेजी शासन के विरूद्ध आजादी की लड़ाई के समय की है। तत्समय अवध के नवाब वाजिद अली शाह की सेना में “पासी पल्टन” नाम की फौज हुआ करती थी। नवाब वाजिद अली शाह के लखनऊ से जाने के पश्चात् सिकन्दरबाग का इलाका पासी रक्षक महिलाओं की देख-रेख में था। सर कालिन कैम्पवेल इस क्षेत्र पर कब्जा करने के लिए अपना जाल बिछा रहा था। 16 नवम्बर 1857 को अंग्रेजी सेनाओं नें सिकन्दर बाग को चारों ओर से घेर लिया था, फलस्वरूप अंग्रेजी सेना और क्रान्तिकारियों की सेना के बीच घमासान युद्ध प्रारम्भ हो गया।


युद्ध के परिपेक्ष्य में श्री जी.पी. मलिसन नें “इन्डियन म्यूटिनी” नामक पुस्तिका के वाल्यूम प्ट के पृष्ठ संख्या 132 में लिखा है कि “क्रान्तिकारियों नें अपनें जान की बाजी लगाकर पूरी वीरता के साथ युद्ध किया हमारी सेना रास्ता चीरती हुई अन्दर घुस आई तब भी संग्राम बन्द नहीं हुआ”। एक-एक कोने के लिए संग्राम होता रहा।”


इस युद्ध में रक्षक पासी महिलाऐं जनानी फौजों के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर लड़ रही थी। फोर्विस मिचाईल नें अपनें संस्मरणों में वीरांगना ऊदादेवी पासी की वीरता का भरपूर वर्णन किया है। इस वीरांगना के बारे में उसनें 93वीं बटालियन के अंग्रेज सिपाही से सुना था।


लड़ाई के दिन भीषण गर्मी थी। गोलाबारी से पूरा क्षेत्र तप उठा था। अंग्रेजी सेना की 53वीं बटालियन और 93वीं बटालियन नें अधिकांश क्रान्तिकारियों का वध कर दिया था। वहीं सिकन्दर बाग में एक बड़े पीपल के पेड़ के नीचे बड़े-बड़े मिट्टी के घड़ों में पीनें का पानी भरा था। अपनें संगी साथियों के मारे जानें के तुरन्त बाद वीरांगना ऊदादेवी पासी उसी पीपल के पेड़ पर अपनें हथियारों के साथ लपक कर चढ़ गयी और उन्होंनें अपनें आपको पीपल की पत्तियों और डालियों से छुपा लिया, फिर उन्होंनें मोर्चा सम्हाल लिया और पेड़ के नीचे आनें वाले अंग्रेज सिपाहियों को चुन-चुन कर मारना शुरू कर दिया। देखते ही देखते उन्होंनें 36 से अधिक अंग्रेजी सिपाहियों को मौत के घाट उतार दिया। वे तब तक अंग्रेजों का वध करती रहीं जब तक उनकी गोली-बारूद समाप्त नहीं हो गयी।


इस बीच मेजर डाउसन उधर आ गया, उसने देखा कि 36 अंग्रेजी सैनिक पेड़ के पास मरे पड़े ह,ै तो उसनें कैप्टेन वैलेस को आवाज देकर बुलाया। कैप्टन वैलेस एक चतुर सेनानायक था। उसनें मेजर डाउसन को चिल्ला कर बताया कि पीपल के पेड़ पर से किसी के द्वारा इन अंग्रेजी सिपाहियों की हत्या की गयी है। उसनें तुरन्त निशाना साधा और वीरांगना ऊदादेवी पासी के ऊपर प्राण घातकफायर किया। चूंकि वीरांगना ऊदादेवी पासी के पास गोलियां एवं कारतूस समाप्त हो गये थे। अतः वे जवाबी फायर नहीं कर सकीं। गोली लगते ही वे पेड़ से नीचे गिरी और उनकी इहलीला समाप्त हो गयी। गोली लगनें के समय वीरांगना ऊदादेवी पासी लाल जैकेट पहनें हुयी थीं। जब वे पेड़ से नीचे गिरी तो जैकेट का ऊपरी भाग खुल गया। तब कैप्टेन वैलेस एवं मेजर डाउसन को पता चला कि वीरगति को प्राप्त क्रान्तिकारी एक महिला है। कैप्टेन वैलेस एक वीर क्रान्तिकारी महिला की वीरता पर आश्चर्य चकित हो, जोर-जोर से रोनें लगा और कहनें लगा कि यदि मुझे पता होता कि पेड़ की ओट में छुप कर अंग्रेजी सेना को हताहत करनें वाली क्रान्तिकारी एक वीरांगना महिला है तो चाहे मुझे हजार बार मरना पड़ता किन्तु मैं गोली नहीं चलाता।


फोर्बस मिशायल (William Forbes Mitchell) ने अपनी पुस्तक "Reminiscences of the Great Mutiny" के पृष्ठ - 57,58 पर इसका उल्लेख इस प्रकार किया है:- As told by Sergeant William Forbes Michell of tales 93rd High landers :- "In the centre of the inner court of the Secunderbagh there was a large Peepul tree with a bushy top, round the foot of which were set a number of jars full of cool water. When the slaughter was almost over many of our men went under the tree for the sake of its shade, and to quench their burning thirst with a drought of the cool water from the jars. A number, however, lay dead under this tree, both of the 53rd and the 93rd, and the many bodies laying in the particular spot attracted the notice of Captain Dowson, After having carefully examined the wounds, he noticed that in every case the men had evidently been shot from above, He there upon stepped out from beneath the tree, and called Captain Tucker Wallace to look up if he could see any one in the top of the tree, because all the dead under it had apparently been shot from the above.Wallace hadhis rifle loaded and stepping back he carefully scanned the top tree, He almost immediately called out. I see him Sir ! And holding his rifle he repeated aloud. " I'll pay vows now to the Lord, Before His people all. " He fired and down fell a body, dresses in a tight fitting red Jacket and rose coloured silk trouser and the breast of the jacket bursting open with the fall, showed that the wearer was a women, when the Wallace saw that the person whom he shot was a women, he burst in to tears exclaiming. If I had known it was a women. I would rather have died a thousand deaths than have harmed her. "Reminiscences of the great Mutiny" by William Forbes. Mitechell. .............a women who perched on a large peepul tree in the court of Sikandar Bagh shot a number of British soldiers and was shot in her turn.


वीरांगना ऊदादेवी पासी की एक वक्ष प्रतिमा, जो सीमेन्ट की बनी थी, 30 जून 1973 को लखनऊ के तत्कालीन मेयर डा. दाऊजी गुप्त के प्रयास से सन् 1857 ई. की स्वतंत्रता संग्राम समारोह समिति के द्वारा सिकन्दरबाग में स्थापित करायी गयी थी। वीरांगना ऊदादेवी पासी की एक आदमकद कांस्य मूर्ति उत्तर प्रदेश सरकार के द्वारा सिकन्दरबाग चौराहा, लखनऊ (उ.प्र.) में लगभग बारह लाख रुपये की लागत से लगवायी गयी है। इन दोनों ही स्थानों पर लोग 30 जून और 16 नवम्बर को भारी संख्या में एकत्र होकर देश की प्रथम महिला शहीद वीरांगना ऊदादेवी पासी को अपने श्रृद्धा-सुमन अर्पित करते हैं।


किसी शायर ने ठीक ही कहा है कि:-


शहीदों की मजारों पर लगेंगे हर बरस मेले।

       वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशाँ होगा।।


अमर शहीद वीरांगना उदा देवी अमर रहे 

Saturday, 29 June 2024

देहदानी : शिवराम पंत जोगलेकर / पूण्य तिथि - 29 जून

 देहदानी : शिवराम पंत जोगलेकर /  पूण्य तिथि - 29 जून


बात 1943 की है। श्री गुरुजी ने युवा प्रचारक शिवराम जोगलेकर से पूछा - क्यों शिवराम, तुम्हें रोटी अच्छी लगती है या चावल ?


शिवराम जी ने कुछ संकोच से कहा - गुरुजी, मैं संघ का प्रचारक हूं। रोटी या चावल, जो मिल जाए, वह खा लेता हूं। श्री गुरुजी ने कहा - अच्छा, तो तुम चेन्नई चले जाओ, अब तुम्हें वहां संघ का काम करना है। इस प्रकार शिवराम जी संघ कार्य के लिए तमिलनाडु में आये, तो फिर अंतिम सांस भी उन्होंने वहीं ली।


शिवराम जी का जन्म 1917 में बागलकोट (कर्नाटक) में हुआ था। उनके पिता श्री यशवंत जोगलेकर डाक विभाग में काम करते थे; पर जब शिवराम जी केवल एक वर्ष के थे, तब ही उनका देहांत हो गया। ऐसे में उनका पालन मां श्रीमती सरस्वती जोगलेकर ने अपनी ससुराल सांगली में बड़े कष्टपूर्वक किया।


छात्र जीवन में वे अपने अध्यापक श्री चिकोडीकर के राष्ट्रीय विचारों से बहुत प्रभावित हुए। उनके आग्रह पर शिवराम जी ने ‘वीर सावरकर’ के जीवन पर एक ओजस्वी भाषण दिया। युवावस्था में पूज्य मसूरकर महाराज की प्रेरणा से शिवराम जी ने जीवन भर देश की ही सेवा करने का व्रत ले लिया।


सांगली में पढ़ते समय 1932 में डा. हेडगेवार के दर्शन के साथ ही उनके जीवन में संघ-यात्रा प्रारम्भ हुई। 1936 में इंटर उत्तीर्ण कर वे पुणे आ गये। यहां उन्हें नगर कार्यवाह की जिम्मेदारी दी गयी। 1938 में बी.एस-सी पूर्ण कर उन्होंने ‘वायु में धूलकणों की गति’ पर एक लघु शोध प्रबंध भी लिखा।


21 जून, 1940 को जब उन्हें डा. हेडगेवार के देहांत का समाचार मिला, वे पुणे में मौसम विभाग की प्रयोगशाला में काम कर रहे थे। उन्होंने तत्काल प्रचारक बनने का निश्चय कर लिया; पर पुणे के संघचालक श्री विनायकराव आप्टे ने पहले उन्हें अपनी शिक्षा पूरी करने का आग्रह किया। अतः शिवराम जी 1942 में स्वर्ण पदक के साथ एम.एस-सी उत्तीर्ण कर प्रचारक बने।


सर्वप्रथम उन्हें मुंबई भेजा गया और फिर 1943 में चेन्नई। तमिलनाडु संघ कार्य के लिए प्रारम्भ में बहुत कठिन क्षेत्र था। वहां के राजनेताओं ने जनता में यह भ्रम निर्माण किया था कि उत्तर भारत वालों ने सदा से हमें दबाकर रखा है। वहां हिन्दी के साथ ही हिन्दू का भी व्यापक विरोध होता था। ऐसे वातावरण में शिवराम जी ने सर्वप्रथम मजदूर वर्ग के बीच शाखाएं प्रारम्भ कीं। इसके लिए उन्होंने व्यक्तिगत संबंध बनाने पर अधिक जोर दिया।


उन दिनों संघ के पास पैसा तो था नहीं, अतः शिवराम जी पैदल घूमते हुए नगर की निर्धन बस्तियों तथा निकटवर्ती गांवों में सम्पर्क करते थे। वहां की पेयजल, शिक्षा, चिकित्सा जैसी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उन्होंने अनेक सेवा केन्द्र प्रारम्भ किये। इससे उनके उठने-बैठने और भोजन-विश्राम के स्थान  क्रमशः बढ़ने लगे। इसमें से ही फिर कुछ शाखाएं भी प्रारम्भ हुईं। सेवा से हिन्दुत्व जागरण एवं शाखा प्रसार का यह प्रयोग अभिनव था।


शिवराम जी अपने साथ समाचार पत्र रखते थे तथा गांवों में लोगों को उसे पढ़कर सुनाते। वे शिक्षित लोगों को सम्पादक के नाम पत्र लिखने को प्रेरित करते थे। इसमें से ही आगे चलकर ‘विजिल’ नामक संस्था की स्थापना हुई। इस प्रकल्प से हजारों शिक्षित लोग संघ से जुड़े। आज तमिलनाडु में संघ कार्य का जो सुदृढ़ आधार है, उसके पीछे शिवराम जी की ही साधना है।


60 वर्ष तक तमिलनाडु में संघ के विविध दायित्व निभाते हुए 29 जून, 1999 को शिवराम जी का देहांत हुआ। उनकी इच्छानुसार मृत्योपरांत उनकी देह चिकित्सा कार्य के लिए दान कर दी गयी।

वंदेमातरम् संघ शक्ति कलयुगे

Thursday, 27 June 2024

बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय 27 june

 " वंदे मातरम् " के मंत्रद्रष्टा ऋषि बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय की जन्म जयंती के शुभ अवसर पर

पराधीन भारत में 27 जून 1838 ई को रात्रि 9:00 बजे बंगाल के 24 परगना जिला अंतर्गत नैहाटी के निकट काठलापाड़ा गांव में एक दिव्य-विभूति ने जन्म लिया , जिसका नाम बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय (चटर्जी) था। जन्म के पश्चात् ही उनके असाधारण प्रतिभा की झलक मिलने लगी। 5 वर्ष की आयु से उनकी शिक्षा प्रारंभ हुई थी। उन्होंने एक ही दिन में वर्ण-परिचय (अक्षर बोध) का ज्ञान प्राप्त कर लिया था। 


अंग्रेजों ने सर्वप्रथम बंगाल में 1858 ई० में बी०ए० की परीक्षा प्रारंभ की थी। बंकिम बाबू कोलकाता विश्वविद्यालय के सर्वप्रथम स्नातक बने। इसी प्रेसीडेंसी कॉलेज में उन्होंने कानून की पढ़ाई बी०एल० की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की और डिप्टी मजिस्ट्रेट का पद ग्रहण किया। उस समय उनकी आयु मात्र 20 वर्ष थी।


हिंदुओं के " श्राद्ध " को लेकर अंग्रेजी अखबार ' स्टेट्समैन ' में मिस्टर हेस्टिंग्स ने एक लेख में हिंदू धर्म पर छींटाकशी की थी। एक साधारण ईसाई के इस दुस्साहस को बंकिम बाबू बर्दाश्त नहीं कर सके और समाचार पत्रों में लिखकर उसका मुंहतोड़ जवाब दिया। यह घटना 1882 ई की थी। 

उस समय अंग्रेज अधिकारी के अत्याचार से जनता काफी पीड़ित थी। अंग्रेज अधिकारियों के साथ बंकिम बाबू का संघर्ष बराबर चलता रहता था। अंग्रेजों के अत्याचार से ऊबकर 1890 ई० में उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया , लेकिन सरकार में 1891 ई० में उन्हें सरकारी नौकरी से मुक्त किया।

उनकी साहित्य साधना निरंतर चलती रही। इस समय उन्होंने प्रथम उपन्यास " दुर्गेशनंदिनी " लिखा।


हम सभी जानते हैं कि दक्षिण अफ्रीका के डरबन में रेलगाड़ी के डिब्बे से अंग्रेजों ने गांधीजी को धक्का मार कर नीचे गिरा दिया था। ऐसी ही घटना  बंकिम बाबू के साथ भी हुई थी , पर परिणाम दूसरा हुआ था। अपनी माता की मृत्यु की शोकावस्था में बंकिम बाबू अपने शरीर को उत्तरीय और चादर से ढक कर खाली पैर कचहरी जाते थे। इसी अवस्था में एक दिन उन्हें रेलगाड़ी से द्वितीय श्रेणी में जाने का अवसर मिला। डिब्बे में दो अंग्रेज शराब पी रहे थे। बंकिम बाबू को देखकर उन दोनों ने बंकिम बाबू को डिब्बे से उतर जाने को कहा , लेकिन बंकिम बाबू ने अत्यंत साहस के साथ उन दोनों को उनकी अंग्रेजी भाषा में फटकार सुनाई। वे दोनों लज्जित हुए और अगले स्टेशन उस डिब्बे को छोड़ दिया। ऐसे निर्भीक थे बंकिम बाबू !


राष्ट्रीय एकता की दृष्टि से उन्होंने ' बंगर्शन ' में लिखा -

" अगर बहु-विवाह बंद करने के लिए कोई कानून बने , तो वह हिंदू - मुसलमान दोनों के लिए होना चाहिए। हिन्दू के लिए बहु - विवाह खराब है , मुसलमान के लिए वह अच्छा है , ऐसा नहीं। "

बंकिम बाबू ने " धर्मतत्व " में लिखा -

" भारत के राजपूतों के परास्त होते ही भारत आसानी से मुसलमान के अधिकार में चला गया। यदि राजपूत की तरह भारत की अन्य जातियां लड़ने में सक्षम होतीं , तो भारत की यह दुर्दशा नहीं होती। 

आत्मरक्षा , स्वजनरक्षा तथा स्वदेशरक्षा के लिए शारीरिक शिक्षा ग्रहण करना सभी का कर्तव्य है। "

डॉक्टर केशव हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की दैनंदिन शाखाओं के माध्यम से बंकिम बाबू के इस अमूल्य एवं अमूर्त विचार को मूर्तरूप प्रदान किया।


बंकिमचंद्र ने जन्मभूमि के मातृरूप का दर्शन 1875 ई० में अपनी रचना " कमलाकांत की बैठकों " में प्रस्तुत किया है। बंकिम बाबू ने अपने उपन्यास ' आनंद मठ ' में मूलमंत्र के रूप में " वंदे मातरम् " जैसे आदर्श गीत को समाज को दिया है। वंदे मातरम में देशवासियों को नि:स्वार्थ देशसेवा के लिए आह्वान किया गया है। इस मंत्र से जागृत होकर उस समय के युवकों की टोलियां स्वतंत्रता आंदोलन में आत्माहुति देने लगी थीं। यह मुक्ति मंत्र किसी प्रदेश में सीमाबद्ध न होकर कोटि-कोटि कंठों से आसेतु हिमाचल गुंजित होने लगा था। फांसी के फंदे पर या पुलिस की लाठियों-गोलियों का सामना करने वाले शहीदों के अंतिम उद्घोष हुआ करते थे - " वंदे मातरम्।"


बंकिम बाबू के " वंदे मातरम् " से प्रेरित होकर विश्वकवि रवींद्र नाथ ठाकुर ने विजय सम्मेलन , रक्षाबंधन , शिवाजी उत्सव आदि कार्यक्रमों द्वारा समाज को एक सूत्र में बांधने का प्रयास किया था। यह भी अद्भुत संयोग है कि गीत श्री बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय का और स्वर श्री रवीन्द्र नाथ ठाकुर का।

" वंदे मातरम्" के मंत्रद्रष्टा श्री बंकिम बाबू को उनकी जन्म जयंती पर शत-शत नमन।

Monday, 24 June 2024

देश विभाजन और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी #डॉ_विवेक_आर्य

 देश विभाजन और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी 


#डॉ_विवेक_आर्य 


देशवासी प्रायः यह सोचते हैं कि देश विभाजन का कार्य जिन्ना ने किया। मगर बहुत कम को ज्ञात हैं कि मुसलमानों को राष्ट्रविरोधी बनाने में अलीगढ मुस्लिम का हाथ रहा है। इसके संस्थापक सर सैय्यद अहमद खान ने लिखा था कि-मैं किसी भी रूप में हिंदुस्तान को एक राष्ट्र मानने को तैयार नहीं हूँ।  


अपनी इस मान्यता का प्रचार व प्रसार करने के लिए सर सैय्यद अहमद खां ने 1857 में मुहम्मद-एंग्लो-ओरिएण्टल-कॉलेज की स्थापना की जिसने 1920 में अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का रूप धारण किया। 1883 में बैंक नमक एक अंग्रेज की नियुक्ति इस कॉलेज के प्रिंसिपल के पद पर हुई। 1899 तक यह व्यक्ति अपने पद पर रहा। इन 16 वर्षों की अवधि में सर सैय्यद इसके पूरी तरह प्रभाव में रहे। परिणाम ये दोनों राष्ट्र विरोधी गतिविधियों का केंद्र बन गये। बैंक ने इंग्लैंड से भारत रवाना होने से पूर्व एक भाषण दिया जिसमें उसने बोला था कि-


भारत के मुसलमान हिन्दुओं के दवाब में है। वहां के मुसलमान इसका विरोध करते हैं और इसलिए वो इसे चुप रहकर स्वीकार नहीं करेंगे।   


1885 में कांग्रेस की स्थापना के 3 वर्ष बाद बैंक की सलाह पर सैय्यद अहमद ने Patriotic Association के नाम से एक संगठन बनाया जिसका उद्देश्य  पार्लियामेंट को यह विश्वास दिलाना था कि भारत के मुसलमान स्वराज्य आदि के संघर्ष में हिन्दुओं के साथ नहीं हैं। 1899 में इंग्लैंड की संसद में सर चार्ल्स ब्रैडला ने भारत में अंशत: लोकतंत्रात्मक शासन पद्यति लागू करने के लिए पार्लियामेंट में एक बिल प्रस्तुत किया। बैंक ने इस बिल का विरोध करने के लिए अलीगढ़ कॉलेज के विद्यार्थियों को देश के कौने-कौने में भेजा और मुसलमानों के हस्ताक्षर कराये। कुछ विद्यार्थियों को लेकर वह स्वयं दिल्ली पहुँचा और जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर बैठ गया। ज़ुम्मे की नमाज़ से लौटते मुसलमानों से इस ज्ञापन पर यह कहकर हस्ताक्षर करवाये कि यह ज्ञापन मुसलमानों की ओर से सरकार से यह अनुरोध किया गया है कि वह गौहत्या पर रोक लगाकर मुसलमानों के धार्मिक अधिकारों में हस्तक्षेप न करे। इस प्रकार बिल के विरोध में 

20375 मुसलमानों हस्ताक्षर कराके इंग्लैंड भेजें गये। 


1895 में बैंक ने इंग्लैंड में एक भाषा दिया था जिसमें उसने कहा था-अंग्रेजों के साथ तो मुसलमानों का मेल हो सकता है, परन्तु अन्य किसी मत वाले के साथ नहीं। 


इस प्रकार की भावना के रहते सांप्रदायिक सद्भाव तथा देशभक्ति का ख्याल भी मुसलमानों के भीतर कैसे ठहर सकता था। अहमद खान और बैंक के निधन के बाद उसके उत्तराधिकारी थियोडोर मेरीसन ने बैंक का काम जारी रखा। उसने मुस्लिम छात्रों को यह कहकर भड़काया कि भारत में लोकतंत्र का अर्थ होगा-अल्पसंख्यकों का लकड़हारे, घसियारे और पानी भरने वाले झींवर बन जाना। उसके बाद प्रिंसिपल पद पर आर्चिवाल्ड नामक अंग्रेज आया। उन दिनों बंग विभाजन की धूम थी। यह अंग्रेज शिमला जाकर वाइसराय से मुसलमानों को विशेष प्रतिनिधित्व देने की अपील करता है। उसके द्वारा तैयार किये गए ज्ञापन को लेकर सर आगा खान के नेतृत्व में 1 अक्टूबर 1906 को एक शिष्ट मण्डल वाइसराय से इसके लिए मिला। अंग्रेज पहले से तैयार थे। वाइसराय की पत्नी लेडी मिण्टो को एक अधिकारी ने लिखा कि- इस प्रकार 6 करोड़ मुसलमानों को राष्ट्र मुख्य धारा से काटकर उन्हें हिन्दू और हिंदुस्तान दोनों का विरोधी बना दिया गया। लेडी मिण्टो ने अपनी डायरी में लिखा कि- इस प्रकार के खादपानी से साम्प्रदायिकता का विषवृक्ष फलता-फूलता रहा। बहुत जल्दी इसकी शाखा प्रशाखा दूर तक फैल गयी। 3 महीने बाद 30 दिसंबर 1906 को ढाका में मुस्लिम लीग की स्थापना के 3 महीने बाद ही अलीगढ के विद्यार्थियों को सम्बोधित करते हुए वकारुल मालिक ने कहा-


साम्प्रदायिकता से विषाक्त अलीगढ कॉलेज की नींव पर ही अलीगढ़ यूनिवर्सिटी खड़ी हुई। अलीगढ़ यूनिवर्सिटी की एक-एक ईंट, वहां के पेड़-पौधों की एक-एक पत्ती में इतना विष भरा है कि उसे जड़ मूल से उखाड़े बिना सांप्रदायिक विद्वेष की भावना को दूर नहीं किया जा सकता। इस्लाम के नाम पर मुसलमानों को राष्ट्रविरोधी बनाने में अलीगढ़ यूनिवर्सिटी का बड़ा हाथ रहा है। अपनी परम्पराओं के अनुरूप यहाँ से शिक्षित दीक्षित मुसलमानों ने 1920-1947 तक जजों कुछ किया उसी के परिणाम स्वरूप 1947 में बंटवारा हुआ। 


मार्च 1947 में वाइसराय बनकर भारत आये माउंट बेटन आने से पहले भारत के धुर विरोधी चर्चिल से मिला। 


 ने उससे कहा-मुझे खेद है कि तुमको भारत को स्वतंत्रता देनी पड़ रही है। मैं यह नहीं कहूंगा कि कैसे देनी है। पर यह अवश्य कहूंगा कि किसी भी मुसलमान का बाल भी बांका नहीं होना चाहिये। ये  ये वो लोग हैं, जो हमारे मित्र है। और ये वो है जिन्हें हिन्दू अब दबा कर रखेगा। इसलिए आपको ऐसे कदम उठाने चाहिए कि हिन्दू ऐसा न कर सकें। 


चर्चिल की सलाह पर भारत का ऐसा विभाजन हुआ कि मुसलमानों को पाकिस्तान के रूप में एक स्वतंत्र देश मिल गया भारत पर उनका पूर्ण अधिकार ज्यों का त्यों बना रह गया। यही हिन्दू मुस्लिम समस्या आज भी ऐसी ही बनी हुई है। आज भी भारत के अधिकांश मुसलमानों के मन में पाकिस्तान के प्रति जो प्यार है।  वो भारत के लिये नहीं है। स्वर्गीय बलराज मधोक ने इंदिरा गाँधी को कभी सलाह दी थी कि अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का डीएवी कॉलेज, लाहौर से बदल देना चाहिये ताकि यह विष वृक्ष सदा के लिए उखड़ जाये। पर इंदिरा गाँधी ने तुष्टिकरण के चलते उनकी सलाह पर ध्यान नहीं दिया।  

      


पाठकों को अंत में एक ही बात कहकर लेख को विराम दूंगा- जिस कौम ने अपने इतिहास से नहीं सीखा। उसका वर्तमान ही नहीं भविष्य भी अंधकारमय होने वाला है। 


[सन्दर्भ ग्रन्थ-स्वामी विद्यानन्द सरस्वती अभिनन्दन ग्रन्थ, डॉ रघुबीर वेदालंकार (संपादक), श्री सत्य सनातन वेद मंदिर, दिल्ली,1995, पृ. 49-52]

Saturday, 22 June 2024

22 जून/बलिदान-दिवस नगर सेठ अमरचन्द बांठिया को फांसी

22 जून/बलिदान-दिवस
नगर सेठ अमरचन्द बांठिया को फांसी
स्वाधीनता समर के अमर सेनानी सेठ अमरचन्द मूलतः बीकानेर (राजस्थान) के निवासी थे। वे अपने पिता श्री अबीर चन्द बाँठिया के साथ व्यापार के लिए ग्वालियर आकर बस गये थे। जैन मत के अनुयायी अमरचन्द जी ने अपने व्यापार में परिश्रम, ईमानदारी एवं सज्जनता के कारण इतनी प्रतिष्ठा पायी कि ग्वालियर राजघराने ने उन्हें नगर सेठ की उपाधि देकर राजघराने के सदस्यों की भाँति पैर में सोने के कड़े पहनने का अधिकार दिया। आगे चलकर उन्हें ग्वालियर के राजकोष का प्रभारी नियुक्त किया।
अमरचन्द जी बड़े धर्मप्रेमी व्यक्ति थे। 1855 में उन्होंने चातुर्मास के दौरान ग्वालियर पधारे सन्त बुद्धि विजय जी के प्रवचन सुने। इससे पूर्व वे 1854 में अजमेर में भी उनके प्रवचन सुन चुके थे। उनसे प्रभावित होकर वे विदेशी और विधर्मी राज्य के विरुद्ध हो गये। 1857 में जब अंग्रेजों के विरुद्ध भारतीय सेना और क्रान्तिकारी ग्वालियर में सक्रिय हुए, तो सेठ जी ने राजकोष के समस्त धन के साथ अपनी पैतृक सम्पत्ति भी उन्हें सौंप दी।
उनका मत था कि राजकोष जनता से ही एकत्र किया गया है। इसे जनहित में स्वाधीनता सेनानियों को देना अपराध नहीं है और निजी सम्पत्ति वे चाहे जिसे दें; पर अंग्रेजों ने राजद्रोही घोषित कर उनके विरुद्ध वारण्ट जारी कर दिया। ग्वालियर राजघराना भी उस समय अंग्रेजों के साथ था।
अमरचन्द जी भूमिगत होकर क्रान्तिकारियों का सहयोग करते रहे; पर एक दिन वे शासन के हत्थे चढ़ गये और मुकदमा चलाकर उन्हें जेल में ठूँस दिया गया। सुख-सुविधाओं में पले सेठ जी को वहाँ भीषण यातनाएँ दी गयीं। मुर्गा बनाना, पेड़ से उल्टा लटका कर चाबुकों से मारना, हाथ पैर बाँधकर चारों ओर से खींचना, लोहे के जूतों से मारना, अण्डकोषों पर वजन बाँधकर दौड़ाना, मूत्र पिलाना आदि अमानवीय अत्याचार उन पर किये गये। अंग्रेज चाहते थे कि वे क्षमा माँग लें; पर सेठ जी तैयार नहीं हुए। इस पर अंग्रेजों ने उनके आठ वर्षीय निरपराध पुत्र को भी पकड़ लिया।
अब अंग्रेजों ने धमकी दी कि यदि तुमने क्षमा नहीं माँगी, तो तुम्हारे पुत्र की हत्या कर दी जाएगी। यह बहुत कठिन घड़ी थी; पर सेठ जी विचलित नहीं हुए। इस पर उनके पुत्र को तोप के मुँह पर बाँधकर गोला दाग दिया गया। बच्चे का शरीर चिथड़े-चिथड़े हो गया। इसके बाद सेठ जी के लिए 22 जून, 1858 को फाँसी की तिथि निश्चित कर दी गयी। इतना ही नहीं, नगर और ग्रामीण क्षेत्र की जनता में आतंक फैलाने के लिए अंग्रेजों ने यह भी तय किया गया कि सेठ जी को 'सर्राफा बाजार' में ही फाँसी दी जाएगी।
अन्ततः 22 जून भी आ गया। सेठ जी तो अपने शरीर का मोह छोड़ चुके थे। अन्तिम इच्छा पूछने पर उन्होंने नवकार मन्त्र जपने की इच्छा व्यक्त की। उन्हें इसकी अनुमति दी गयी; पर धर्मप्रेमी सेठ जी को फाँसी देते समय दो बार ईश्वरीय व्यवधान आ गया। एक बार तो रस्सी और दूसरी बार पेड़ की वह डाल ही टूट गयी, जिस पर उन्हें फाँसी दी जा रही थी। तीसरी बार उन्हें एक मजबूत नीम के पेड़ पर लटकाकर फाँसी दी गयी और शव को तीन दिन वहीं लटके रहने दिया गया। 
सर्राफा बाजार स्थित जिस नीम के पेड़ पर सेठ अमरचन्द बाँठिया को फाँसी दी गयी थी, उसके निकट ही सेठ जी की प्रतिमा स्थापित है। हर साल 22 जून को वहाँ बड़ी संख्या में लोग आकर देश की स्वतन्त्रता के लिए प्राण देने वाले उस अमर हुतात्मा श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। बीकानेर में भी मूर्ति बनकर तैयार है, स्थापना होने की तैयारी ।।

Saturday, 15 June 2024

26 जनवरी/जन्म-दिवस स्वतन्त्रता सेनानी रानी मां गाइडिन्ल्यू

 26 जनवरी/जन्म-दिवस


स्वतन्त्रता सेनानी रानी मां गाइडिन्ल्यू


देश की स्वतन्त्रता के लिए ब्रिटिश जेल में भीषण यातनाएँ भोगने वाली गाइडिन्ल्यू का जन्म 26 जनवरी, 1915 को नागाओं की रांगमेयी जनजाति में हुआ था। केवल 13 वर्ष की अवस्था में ही वह अपने चचेरे भाई जादोनांग से प्रभावित हो गयीं। जादोनांग प्रथम विश्व युद्ध में लड़ चुके थे। 


युद्ध के बाद अपने गाँव आकर उन्होंने तीन नागा कबीलों जेमी, ल्यांगमेयी और रांगमेयी में एकता स्थापित करने हेतु ‘हराका’ पन्थ की स्थापना की। आगे चलकर ये तीनों सामूहिक रूप से जेलियांगरांग कहलाये। इसके बाद वे अपने क्षेत्र से अंग्रेजों को भगाने के प्रयास में लग गयेे।


इससे अंग्रेज नाराज हो गये। उन्होंने जादोनांग को 29 अगस्त 1931 को फाँसी दे दी; पर नागाओं ने गाइडिन्ल्यू के नेतृत्व में संघर्ष जारी रखा। अंग्रेजों ने आन्दोलनरत गाँवों पर सामूहिक जुर्माना लगाकर उनकी बन्दूकें रखवा लीं। 17 वर्षीय गाइडिन्ल्यू ने इसका विरोध किया। वे अपनी नागा संस्कृति को सुरक्षित रखना चाहती थीं। हराका का अर्थ भी शुद्ध एवं पवित्र है। उनके साहस एवं नेतृत्वक्षमता को देखकर लोग उन्हें देवी मानने लगे।


अब अंग्रेज गाइडिन्ल्यू के पीछे पड़ गये। उन्होंने उनके प्रभाव क्षेत्र के गाँवों में उनके चित्र वाले पोस्टर दीवारों पर चिपकाये तथा उन्हें पकड़वाने वाले को 500 रु. पुरस्कार देने की घाषिणा की; पर कोई इस लालच में नहीं आया। अब गाइडिन्ल्यू का प्रभाव उत्तरी मणिपुर, खोनोमा तथा कोहिमा तक फैल गया। नागाओं के अन्य कबीले भी उन्हें अपना नेता मानने लगे।


1932 में गाइडिन्ल्यू ने पोलोमी गाँव में एक विशाल काष्ठदुर्ग का निर्माण शुरू किया, जिसमें 40,000 योद्धा रह सकें। उन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष कर रहे अन्य जनजातीय नेताओं से भी सम्पर्क बढ़ाया। गाइडिन्ल्यू ने अपना खुफिया तन्त्र भी स्थापित  ।


23 जनवरी/जन्म-तिथि नेताजी सुभाषचन्द्र बोस

 23 जनवरी/जन्म-तिथि


नेताजी सुभाषचन्द्र बोस


स्वतन्त्रता आन्दोलन के दिनों में जिनकी एक पुकार पर हजारों महिलाओं ने अपने कीमती गहने अर्पित कर दिये, जिनके आह्नान पर हजारों युवक और युवतियाँ आजाद हिन्द फौज में भर्ती हो गये, उन नेताजी सुभाषचन्द्र बोस का जन्म उड़ीसा की राजधानी कटक के एक मध्यमवर्गीय परिवार में 23 जनवरी, 1897 को हुआ था।


सुभाष के अंग्रेजभक्त पिता रायबहादुर जानकीनाथ चाहते थे कि वह अंग्रेजी आचार-विचार और शिक्षा को अपनाएँ। विदेश में जाकर पढ़ें तथा आई.सी.एस. बनकर अपने कुल का नाम रोशन करें; पर सुभाष की माता श्रीमती प्रभावती हिन्दुत्व और देश से प्रेम करने वाली महिला थीं। वे उन्हें 1857 के संग्राम तथा विवेकानन्द जैसे महापुरुषों की कहानियाँ सुनाती थीं। इससे सुभाष के मन में भी देश के लिए कुछ करने की भावना प्रबल हो उठी।


सुभाष ने कटक और कोलकाता से विभिन्न परीक्षाएँ उत्तीर्ण कीं। फिर पिताजी के आग्रह पर वे आई.सी.एस की पढ़ाई करने के लिए इंग्लैंड चले गये। अपनी योग्यता और परिश्रम से उन्होंने लिखित परीक्षा में पूरे विश्वविद्यालय में चतुर्थ स्थान प्राप्त किया; पर उनके मन में ब्रिटिश शासन की सेवा करने की इच्छा नहीं थी। वे अध्यापक या पत्रकार बनना चाहते थे। बंगाल के स्वतन्त्रता सेनानी देशबन्धु चितरंजन दास से उनका पत्र-व्यवहार होता रहता था। उनके आग्रह पर वे भारत आकर कांग्रेस में शामिल हो गये।


कांग्रेस में उन दिनों गांधी जी और नेहरू की तूती बोल रही थी। उनके निर्देश पर सुभाष बाबू ने अनेक आन्दोलनों में भाग लिया और 12 बार जेल-यात्रा की। 1938 में गुजरात के हरिपुरा में हुए राष्ट्रीय अधिवेशन में वे कांग्रेस के अध्यक्ष बनाये गये; पर फिर उनके गांधी जी से कुछ मतभेद हो गये। गांधी जी चाहते थे कि प्रेम और अहिंसा से आजादी का आन्दोलन चलाया जाये; पर सुभाष बाबू उग्र साधनों को अपनाना चाहते थ ।


22 जनवरी/जन्म-दिवस क्रांतिकारी नृत्यांगना अजीजन बाई

 22 जनवरी/जन्म-दिवस


क्रांतिकारी नृत्यांगना अजीजन बाई


यों तो नृत्यांगना के पेशे को अच्छी नजर से नहीं देखा जाता; पर अजीजन बाई ने सिद्ध कर दिया कि यदि दिल में आग हो, तो किसी भी माध्यम से देश-सेवा की जा सकती है।


अजीजन का जन्म 22 जनवरी, 1824 को मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र में राजगढ़ नगर में हुआ था। उसके पिता शमशेर सिंह बड़े जागीरदार थे। उसका नाम अंजुला रखा गया। एक बार सखियों के साथ हरादेवी मेले में घूमते समय अंग्रेज सिपाहियों ने उसका अपहरण कर लिया। इस दुख में शमशेर सिंह का प्राणान्त हो गया। अंग्रेजों ने उनकी जागीर भी कब्जे में कर ली। कुछ समय तक सिपाही उसके यौवन से खेलते रहे, फिर उसे कानपुर के लाठी मुहाल चकले में 500 रु0 में बेच दिया।


चकले की मालकिन ने उसका नाम अजीजन बाई रखा। इस प्रकार एक हिन्दू युवती मुसलमान बनाकर कोठे पर बैठा दी गयी। मजबूर अजीजन ने समय के साथ समझौता कर पूरे मनोयोग से गीत-संगीत सीखा। इससे उसकी प्रसिद्धि चहुँ ओर फैल गयी। 


उन दिनों सब ओर 1857 की क्रान्ति की तैयारी हो रही थी। 10 मई, 1857 को मेरठ की घटना का समाचार पाकर अजीजन ने 400 वेश्याओं की ‘मस्तानी टोली’ बनाकर उसे अस्त्र-शस्त्र चलाना सिखाकर युद्ध में घायल क्रान्तिकारियों की सेवा में लगा दिया। यह जानकारी नानासाहब, तात्या टोपे आदि तक पहुँची, तो उनके सिर श्रद्धा से नत हो गये।


कहते हैं कि अजीजन बाई तात्या टोपे के प्रति आकर्षित थी; पर जब उसने तात्या का देशप्रेम देखा, तो उसके जीवन की दिशा बदल गयी और वह भी युद्ध के मैदान में उतर गयी। दिन में वह शस्त्र चलाना सीखती और रात में अंग्रेज छावनियों में जाकर उनका दिल बहलाती; पर इसी दौरान वह कई ऐसे रहस्य भी ले आती थी, जो क्रान्तिकारियों के लिए सहायक होते थे। 


अंग्रेजों द्वारा भारतीयों पर किये जा रहे अत्याचारों को देखकर उसका खून खौल उठता था। 15 जुलाई को कानपुर के बीबीघर में अंग्रेज स्  ।


20 जनवरी/बलिदान-दिवस छत्तीसगढ़ के अमर बलिदानी गेंदसिंह

 20 जनवरी/बलिदान-दिवस


छत्तीसगढ़ के अमर बलिदानी गेंदसिंह


छत्तीसगढ़ राज्य का एक प्रमुख क्षेत्र है बस्तर। अंग्रेजों ने अपनी कुटिल था चालों से बस्तर को अपने शिकंजे में जकड़ लिया था। वे बस्तर के वनवासियों का नैतिक, आर्थिक और सामाजिक शोषण कर रहे थे। इससे वनवासी संस्कृति के समाप्त होने का खतरा बढ़ रहा था। अतः बस्तर के जंगल आक्रोश से गरमाने लगे।


उन दिनों परलकोट के जमींदार थे श्री गेंदसिंह। वे पराक्रमी, बुद्धिमान, चतुर और न्यायप्रिय व्यक्ति थे। उनकी इच्छा थी कि उनके क्षेत्र की प्रजा प्रसन्न रहे। उनका किसी प्रकार से शोषण न हो। इसके लिए वे हर सम्भव प्रयास करते थे; पर इस इच्छा में अंग्रेजों के पिट्ठू कुछ जमींदार, व्यापारी और राजकर्मचारी बाधक थे। वे सब उन्हें परेशान करने का प्रयास करते रहते थे।


जब अत्याचारों की पराकाष्ठा होने लगी, तो श्री गंेदसिंह ने 24 दिसम्बर, 1824 को अबूझमाड़ में एक विशाल सभा का आयोजन किया। सभा के बाद गाँव-गाँव में धावड़ा वृक्ष की टहनी भेजकर विद्रोह के लिए तैयार रहने का सन्देश भेजा। 


वृक्ष की टहनी के पीछे यह भाव था कि इस टहनी के पत्ते सूखने से पहले ही सब लोग विद्रोह स्थल पर पहुँच जायें। 4 जनवरी, 1825 को ग्राम, गुफाओं और पर्वत शृंखलाओं से निकल कर वनवासी वीर परलकोट में एकत्र हो गये। सब अपने पारम्परिक अस्त्र-शस्त्रों से लैस थे।


वीर गेंदसिंह ने सबको अपने-अपने क्षेत्र में विद्रोह करने को प्रेरित किया। इससे थोड़े ही समय में पूरा बस्तर सुलग उठा। सरल और शान्त प्रवृत्ति के वनवासी वीर मरने-मारने को तत्पर हो गये। इस विद्रोह का उद्देश्य बस्तर को अंग्रेजी चंगुल से मुक्त कराना था। 


स्थान-स्थान पर खजाना लूटा जाने लगा। अंग्रेज अधिकारियों तथा राज कर्मचारियों को पकड़कर पीटा और मारा जाने लगा। सरकारी भवनों में आग लगा दी गयी। शोषण करने वाले व्यापारियों के गोदाम लूट लिये