" वंदे मातरम् " के मंत्रद्रष्टा ऋषि बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय की जन्म जयंती के शुभ अवसर पर
पराधीन भारत में 27 जून 1838 ई को रात्रि 9:00 बजे बंगाल के 24 परगना जिला अंतर्गत नैहाटी के निकट काठलापाड़ा गांव में एक दिव्य-विभूति ने जन्म लिया , जिसका नाम बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय (चटर्जी) था। जन्म के पश्चात् ही उनके असाधारण प्रतिभा की झलक मिलने लगी। 5 वर्ष की आयु से उनकी शिक्षा प्रारंभ हुई थी। उन्होंने एक ही दिन में वर्ण-परिचय (अक्षर बोध) का ज्ञान प्राप्त कर लिया था।
अंग्रेजों ने सर्वप्रथम बंगाल में 1858 ई० में बी०ए० की परीक्षा प्रारंभ की थी। बंकिम बाबू कोलकाता विश्वविद्यालय के सर्वप्रथम स्नातक बने। इसी प्रेसीडेंसी कॉलेज में उन्होंने कानून की पढ़ाई बी०एल० की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की और डिप्टी मजिस्ट्रेट का पद ग्रहण किया। उस समय उनकी आयु मात्र 20 वर्ष थी।
हिंदुओं के " श्राद्ध " को लेकर अंग्रेजी अखबार ' स्टेट्समैन ' में मिस्टर हेस्टिंग्स ने एक लेख में हिंदू धर्म पर छींटाकशी की थी। एक साधारण ईसाई के इस दुस्साहस को बंकिम बाबू बर्दाश्त नहीं कर सके और समाचार पत्रों में लिखकर उसका मुंहतोड़ जवाब दिया। यह घटना 1882 ई की थी।
उस समय अंग्रेज अधिकारी के अत्याचार से जनता काफी पीड़ित थी। अंग्रेज अधिकारियों के साथ बंकिम बाबू का संघर्ष बराबर चलता रहता था। अंग्रेजों के अत्याचार से ऊबकर 1890 ई० में उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया , लेकिन सरकार में 1891 ई० में उन्हें सरकारी नौकरी से मुक्त किया।
उनकी साहित्य साधना निरंतर चलती रही। इस समय उन्होंने प्रथम उपन्यास " दुर्गेशनंदिनी " लिखा।
हम सभी जानते हैं कि दक्षिण अफ्रीका के डरबन में रेलगाड़ी के डिब्बे से अंग्रेजों ने गांधीजी को धक्का मार कर नीचे गिरा दिया था। ऐसी ही घटना बंकिम बाबू के साथ भी हुई थी , पर परिणाम दूसरा हुआ था। अपनी माता की मृत्यु की शोकावस्था में बंकिम बाबू अपने शरीर को उत्तरीय और चादर से ढक कर खाली पैर कचहरी जाते थे। इसी अवस्था में एक दिन उन्हें रेलगाड़ी से द्वितीय श्रेणी में जाने का अवसर मिला। डिब्बे में दो अंग्रेज शराब पी रहे थे। बंकिम बाबू को देखकर उन दोनों ने बंकिम बाबू को डिब्बे से उतर जाने को कहा , लेकिन बंकिम बाबू ने अत्यंत साहस के साथ उन दोनों को उनकी अंग्रेजी भाषा में फटकार सुनाई। वे दोनों लज्जित हुए और अगले स्टेशन उस डिब्बे को छोड़ दिया। ऐसे निर्भीक थे बंकिम बाबू !
राष्ट्रीय एकता की दृष्टि से उन्होंने ' बंगर्शन ' में लिखा -
" अगर बहु-विवाह बंद करने के लिए कोई कानून बने , तो वह हिंदू - मुसलमान दोनों के लिए होना चाहिए। हिन्दू के लिए बहु - विवाह खराब है , मुसलमान के लिए वह अच्छा है , ऐसा नहीं। "
बंकिम बाबू ने " धर्मतत्व " में लिखा -
" भारत के राजपूतों के परास्त होते ही भारत आसानी से मुसलमान के अधिकार में चला गया। यदि राजपूत की तरह भारत की अन्य जातियां लड़ने में सक्षम होतीं , तो भारत की यह दुर्दशा नहीं होती।
आत्मरक्षा , स्वजनरक्षा तथा स्वदेशरक्षा के लिए शारीरिक शिक्षा ग्रहण करना सभी का कर्तव्य है। "
डॉक्टर केशव हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की दैनंदिन शाखाओं के माध्यम से बंकिम बाबू के इस अमूल्य एवं अमूर्त विचार को मूर्तरूप प्रदान किया।
बंकिमचंद्र ने जन्मभूमि के मातृरूप का दर्शन 1875 ई० में अपनी रचना " कमलाकांत की बैठकों " में प्रस्तुत किया है। बंकिम बाबू ने अपने उपन्यास ' आनंद मठ ' में मूलमंत्र के रूप में " वंदे मातरम् " जैसे आदर्श गीत को समाज को दिया है। वंदे मातरम में देशवासियों को नि:स्वार्थ देशसेवा के लिए आह्वान किया गया है। इस मंत्र से जागृत होकर उस समय के युवकों की टोलियां स्वतंत्रता आंदोलन में आत्माहुति देने लगी थीं। यह मुक्ति मंत्र किसी प्रदेश में सीमाबद्ध न होकर कोटि-कोटि कंठों से आसेतु हिमाचल गुंजित होने लगा था। फांसी के फंदे पर या पुलिस की लाठियों-गोलियों का सामना करने वाले शहीदों के अंतिम उद्घोष हुआ करते थे - " वंदे मातरम्।"
बंकिम बाबू के " वंदे मातरम् " से प्रेरित होकर विश्वकवि रवींद्र नाथ ठाकुर ने विजय सम्मेलन , रक्षाबंधन , शिवाजी उत्सव आदि कार्यक्रमों द्वारा समाज को एक सूत्र में बांधने का प्रयास किया था। यह भी अद्भुत संयोग है कि गीत श्री बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय का और स्वर श्री रवीन्द्र नाथ ठाकुर का।
" वंदे मातरम्" के मंत्रद्रष्टा श्री बंकिम बाबू को उनकी जन्म जयंती पर शत-शत नमन।
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