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Saturday, 29 June 2024

देहदानी : शिवराम पंत जोगलेकर / पूण्य तिथि - 29 जून

 देहदानी : शिवराम पंत जोगलेकर /  पूण्य तिथि - 29 जून


बात 1943 की है। श्री गुरुजी ने युवा प्रचारक शिवराम जोगलेकर से पूछा - क्यों शिवराम, तुम्हें रोटी अच्छी लगती है या चावल ?


शिवराम जी ने कुछ संकोच से कहा - गुरुजी, मैं संघ का प्रचारक हूं। रोटी या चावल, जो मिल जाए, वह खा लेता हूं। श्री गुरुजी ने कहा - अच्छा, तो तुम चेन्नई चले जाओ, अब तुम्हें वहां संघ का काम करना है। इस प्रकार शिवराम जी संघ कार्य के लिए तमिलनाडु में आये, तो फिर अंतिम सांस भी उन्होंने वहीं ली।


शिवराम जी का जन्म 1917 में बागलकोट (कर्नाटक) में हुआ था। उनके पिता श्री यशवंत जोगलेकर डाक विभाग में काम करते थे; पर जब शिवराम जी केवल एक वर्ष के थे, तब ही उनका देहांत हो गया। ऐसे में उनका पालन मां श्रीमती सरस्वती जोगलेकर ने अपनी ससुराल सांगली में बड़े कष्टपूर्वक किया।


छात्र जीवन में वे अपने अध्यापक श्री चिकोडीकर के राष्ट्रीय विचारों से बहुत प्रभावित हुए। उनके आग्रह पर शिवराम जी ने ‘वीर सावरकर’ के जीवन पर एक ओजस्वी भाषण दिया। युवावस्था में पूज्य मसूरकर महाराज की प्रेरणा से शिवराम जी ने जीवन भर देश की ही सेवा करने का व्रत ले लिया।


सांगली में पढ़ते समय 1932 में डा. हेडगेवार के दर्शन के साथ ही उनके जीवन में संघ-यात्रा प्रारम्भ हुई। 1936 में इंटर उत्तीर्ण कर वे पुणे आ गये। यहां उन्हें नगर कार्यवाह की जिम्मेदारी दी गयी। 1938 में बी.एस-सी पूर्ण कर उन्होंने ‘वायु में धूलकणों की गति’ पर एक लघु शोध प्रबंध भी लिखा।


21 जून, 1940 को जब उन्हें डा. हेडगेवार के देहांत का समाचार मिला, वे पुणे में मौसम विभाग की प्रयोगशाला में काम कर रहे थे। उन्होंने तत्काल प्रचारक बनने का निश्चय कर लिया; पर पुणे के संघचालक श्री विनायकराव आप्टे ने पहले उन्हें अपनी शिक्षा पूरी करने का आग्रह किया। अतः शिवराम जी 1942 में स्वर्ण पदक के साथ एम.एस-सी उत्तीर्ण कर प्रचारक बने।


सर्वप्रथम उन्हें मुंबई भेजा गया और फिर 1943 में चेन्नई। तमिलनाडु संघ कार्य के लिए प्रारम्भ में बहुत कठिन क्षेत्र था। वहां के राजनेताओं ने जनता में यह भ्रम निर्माण किया था कि उत्तर भारत वालों ने सदा से हमें दबाकर रखा है। वहां हिन्दी के साथ ही हिन्दू का भी व्यापक विरोध होता था। ऐसे वातावरण में शिवराम जी ने सर्वप्रथम मजदूर वर्ग के बीच शाखाएं प्रारम्भ कीं। इसके लिए उन्होंने व्यक्तिगत संबंध बनाने पर अधिक जोर दिया।


उन दिनों संघ के पास पैसा तो था नहीं, अतः शिवराम जी पैदल घूमते हुए नगर की निर्धन बस्तियों तथा निकटवर्ती गांवों में सम्पर्क करते थे। वहां की पेयजल, शिक्षा, चिकित्सा जैसी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उन्होंने अनेक सेवा केन्द्र प्रारम्भ किये। इससे उनके उठने-बैठने और भोजन-विश्राम के स्थान  क्रमशः बढ़ने लगे। इसमें से ही फिर कुछ शाखाएं भी प्रारम्भ हुईं। सेवा से हिन्दुत्व जागरण एवं शाखा प्रसार का यह प्रयोग अभिनव था।


शिवराम जी अपने साथ समाचार पत्र रखते थे तथा गांवों में लोगों को उसे पढ़कर सुनाते। वे शिक्षित लोगों को सम्पादक के नाम पत्र लिखने को प्रेरित करते थे। इसमें से ही आगे चलकर ‘विजिल’ नामक संस्था की स्थापना हुई। इस प्रकल्प से हजारों शिक्षित लोग संघ से जुड़े। आज तमिलनाडु में संघ कार्य का जो सुदृढ़ आधार है, उसके पीछे शिवराम जी की ही साधना है।


60 वर्ष तक तमिलनाडु में संघ के विविध दायित्व निभाते हुए 29 जून, 1999 को शिवराम जी का देहांत हुआ। उनकी इच्छानुसार मृत्योपरांत उनकी देह चिकित्सा कार्य के लिए दान कर दी गयी।

वंदेमातरम् संघ शक्ति कलयुगे

Thursday, 27 June 2024

बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय 27 june

 " वंदे मातरम् " के मंत्रद्रष्टा ऋषि बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय की जन्म जयंती के शुभ अवसर पर

पराधीन भारत में 27 जून 1838 ई को रात्रि 9:00 बजे बंगाल के 24 परगना जिला अंतर्गत नैहाटी के निकट काठलापाड़ा गांव में एक दिव्य-विभूति ने जन्म लिया , जिसका नाम बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय (चटर्जी) था। जन्म के पश्चात् ही उनके असाधारण प्रतिभा की झलक मिलने लगी। 5 वर्ष की आयु से उनकी शिक्षा प्रारंभ हुई थी। उन्होंने एक ही दिन में वर्ण-परिचय (अक्षर बोध) का ज्ञान प्राप्त कर लिया था। 


अंग्रेजों ने सर्वप्रथम बंगाल में 1858 ई० में बी०ए० की परीक्षा प्रारंभ की थी। बंकिम बाबू कोलकाता विश्वविद्यालय के सर्वप्रथम स्नातक बने। इसी प्रेसीडेंसी कॉलेज में उन्होंने कानून की पढ़ाई बी०एल० की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की और डिप्टी मजिस्ट्रेट का पद ग्रहण किया। उस समय उनकी आयु मात्र 20 वर्ष थी।


हिंदुओं के " श्राद्ध " को लेकर अंग्रेजी अखबार ' स्टेट्समैन ' में मिस्टर हेस्टिंग्स ने एक लेख में हिंदू धर्म पर छींटाकशी की थी। एक साधारण ईसाई के इस दुस्साहस को बंकिम बाबू बर्दाश्त नहीं कर सके और समाचार पत्रों में लिखकर उसका मुंहतोड़ जवाब दिया। यह घटना 1882 ई की थी। 

उस समय अंग्रेज अधिकारी के अत्याचार से जनता काफी पीड़ित थी। अंग्रेज अधिकारियों के साथ बंकिम बाबू का संघर्ष बराबर चलता रहता था। अंग्रेजों के अत्याचार से ऊबकर 1890 ई० में उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया , लेकिन सरकार में 1891 ई० में उन्हें सरकारी नौकरी से मुक्त किया।

उनकी साहित्य साधना निरंतर चलती रही। इस समय उन्होंने प्रथम उपन्यास " दुर्गेशनंदिनी " लिखा।


हम सभी जानते हैं कि दक्षिण अफ्रीका के डरबन में रेलगाड़ी के डिब्बे से अंग्रेजों ने गांधीजी को धक्का मार कर नीचे गिरा दिया था। ऐसी ही घटना  बंकिम बाबू के साथ भी हुई थी , पर परिणाम दूसरा हुआ था। अपनी माता की मृत्यु की शोकावस्था में बंकिम बाबू अपने शरीर को उत्तरीय और चादर से ढक कर खाली पैर कचहरी जाते थे। इसी अवस्था में एक दिन उन्हें रेलगाड़ी से द्वितीय श्रेणी में जाने का अवसर मिला। डिब्बे में दो अंग्रेज शराब पी रहे थे। बंकिम बाबू को देखकर उन दोनों ने बंकिम बाबू को डिब्बे से उतर जाने को कहा , लेकिन बंकिम बाबू ने अत्यंत साहस के साथ उन दोनों को उनकी अंग्रेजी भाषा में फटकार सुनाई। वे दोनों लज्जित हुए और अगले स्टेशन उस डिब्बे को छोड़ दिया। ऐसे निर्भीक थे बंकिम बाबू !


राष्ट्रीय एकता की दृष्टि से उन्होंने ' बंगर्शन ' में लिखा -

" अगर बहु-विवाह बंद करने के लिए कोई कानून बने , तो वह हिंदू - मुसलमान दोनों के लिए होना चाहिए। हिन्दू के लिए बहु - विवाह खराब है , मुसलमान के लिए वह अच्छा है , ऐसा नहीं। "

बंकिम बाबू ने " धर्मतत्व " में लिखा -

" भारत के राजपूतों के परास्त होते ही भारत आसानी से मुसलमान के अधिकार में चला गया। यदि राजपूत की तरह भारत की अन्य जातियां लड़ने में सक्षम होतीं , तो भारत की यह दुर्दशा नहीं होती। 

आत्मरक्षा , स्वजनरक्षा तथा स्वदेशरक्षा के लिए शारीरिक शिक्षा ग्रहण करना सभी का कर्तव्य है। "

डॉक्टर केशव हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की दैनंदिन शाखाओं के माध्यम से बंकिम बाबू के इस अमूल्य एवं अमूर्त विचार को मूर्तरूप प्रदान किया।


बंकिमचंद्र ने जन्मभूमि के मातृरूप का दर्शन 1875 ई० में अपनी रचना " कमलाकांत की बैठकों " में प्रस्तुत किया है। बंकिम बाबू ने अपने उपन्यास ' आनंद मठ ' में मूलमंत्र के रूप में " वंदे मातरम् " जैसे आदर्श गीत को समाज को दिया है। वंदे मातरम में देशवासियों को नि:स्वार्थ देशसेवा के लिए आह्वान किया गया है। इस मंत्र से जागृत होकर उस समय के युवकों की टोलियां स्वतंत्रता आंदोलन में आत्माहुति देने लगी थीं। यह मुक्ति मंत्र किसी प्रदेश में सीमाबद्ध न होकर कोटि-कोटि कंठों से आसेतु हिमाचल गुंजित होने लगा था। फांसी के फंदे पर या पुलिस की लाठियों-गोलियों का सामना करने वाले शहीदों के अंतिम उद्घोष हुआ करते थे - " वंदे मातरम्।"


बंकिम बाबू के " वंदे मातरम् " से प्रेरित होकर विश्वकवि रवींद्र नाथ ठाकुर ने विजय सम्मेलन , रक्षाबंधन , शिवाजी उत्सव आदि कार्यक्रमों द्वारा समाज को एक सूत्र में बांधने का प्रयास किया था। यह भी अद्भुत संयोग है कि गीत श्री बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय का और स्वर श्री रवीन्द्र नाथ ठाकुर का।

" वंदे मातरम्" के मंत्रद्रष्टा श्री बंकिम बाबू को उनकी जन्म जयंती पर शत-शत नमन।

Monday, 24 June 2024

देश विभाजन और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी #डॉ_विवेक_आर्य

 देश विभाजन और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी 


#डॉ_विवेक_आर्य 


देशवासी प्रायः यह सोचते हैं कि देश विभाजन का कार्य जिन्ना ने किया। मगर बहुत कम को ज्ञात हैं कि मुसलमानों को राष्ट्रविरोधी बनाने में अलीगढ मुस्लिम का हाथ रहा है। इसके संस्थापक सर सैय्यद अहमद खान ने लिखा था कि-मैं किसी भी रूप में हिंदुस्तान को एक राष्ट्र मानने को तैयार नहीं हूँ।  


अपनी इस मान्यता का प्रचार व प्रसार करने के लिए सर सैय्यद अहमद खां ने 1857 में मुहम्मद-एंग्लो-ओरिएण्टल-कॉलेज की स्थापना की जिसने 1920 में अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का रूप धारण किया। 1883 में बैंक नमक एक अंग्रेज की नियुक्ति इस कॉलेज के प्रिंसिपल के पद पर हुई। 1899 तक यह व्यक्ति अपने पद पर रहा। इन 16 वर्षों की अवधि में सर सैय्यद इसके पूरी तरह प्रभाव में रहे। परिणाम ये दोनों राष्ट्र विरोधी गतिविधियों का केंद्र बन गये। बैंक ने इंग्लैंड से भारत रवाना होने से पूर्व एक भाषण दिया जिसमें उसने बोला था कि-


भारत के मुसलमान हिन्दुओं के दवाब में है। वहां के मुसलमान इसका विरोध करते हैं और इसलिए वो इसे चुप रहकर स्वीकार नहीं करेंगे।   


1885 में कांग्रेस की स्थापना के 3 वर्ष बाद बैंक की सलाह पर सैय्यद अहमद ने Patriotic Association के नाम से एक संगठन बनाया जिसका उद्देश्य  पार्लियामेंट को यह विश्वास दिलाना था कि भारत के मुसलमान स्वराज्य आदि के संघर्ष में हिन्दुओं के साथ नहीं हैं। 1899 में इंग्लैंड की संसद में सर चार्ल्स ब्रैडला ने भारत में अंशत: लोकतंत्रात्मक शासन पद्यति लागू करने के लिए पार्लियामेंट में एक बिल प्रस्तुत किया। बैंक ने इस बिल का विरोध करने के लिए अलीगढ़ कॉलेज के विद्यार्थियों को देश के कौने-कौने में भेजा और मुसलमानों के हस्ताक्षर कराये। कुछ विद्यार्थियों को लेकर वह स्वयं दिल्ली पहुँचा और जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर बैठ गया। ज़ुम्मे की नमाज़ से लौटते मुसलमानों से इस ज्ञापन पर यह कहकर हस्ताक्षर करवाये कि यह ज्ञापन मुसलमानों की ओर से सरकार से यह अनुरोध किया गया है कि वह गौहत्या पर रोक लगाकर मुसलमानों के धार्मिक अधिकारों में हस्तक्षेप न करे। इस प्रकार बिल के विरोध में 

20375 मुसलमानों हस्ताक्षर कराके इंग्लैंड भेजें गये। 


1895 में बैंक ने इंग्लैंड में एक भाषा दिया था जिसमें उसने कहा था-अंग्रेजों के साथ तो मुसलमानों का मेल हो सकता है, परन्तु अन्य किसी मत वाले के साथ नहीं। 


इस प्रकार की भावना के रहते सांप्रदायिक सद्भाव तथा देशभक्ति का ख्याल भी मुसलमानों के भीतर कैसे ठहर सकता था। अहमद खान और बैंक के निधन के बाद उसके उत्तराधिकारी थियोडोर मेरीसन ने बैंक का काम जारी रखा। उसने मुस्लिम छात्रों को यह कहकर भड़काया कि भारत में लोकतंत्र का अर्थ होगा-अल्पसंख्यकों का लकड़हारे, घसियारे और पानी भरने वाले झींवर बन जाना। उसके बाद प्रिंसिपल पद पर आर्चिवाल्ड नामक अंग्रेज आया। उन दिनों बंग विभाजन की धूम थी। यह अंग्रेज शिमला जाकर वाइसराय से मुसलमानों को विशेष प्रतिनिधित्व देने की अपील करता है। उसके द्वारा तैयार किये गए ज्ञापन को लेकर सर आगा खान के नेतृत्व में 1 अक्टूबर 1906 को एक शिष्ट मण्डल वाइसराय से इसके लिए मिला। अंग्रेज पहले से तैयार थे। वाइसराय की पत्नी लेडी मिण्टो को एक अधिकारी ने लिखा कि- इस प्रकार 6 करोड़ मुसलमानों को राष्ट्र मुख्य धारा से काटकर उन्हें हिन्दू और हिंदुस्तान दोनों का विरोधी बना दिया गया। लेडी मिण्टो ने अपनी डायरी में लिखा कि- इस प्रकार के खादपानी से साम्प्रदायिकता का विषवृक्ष फलता-फूलता रहा। बहुत जल्दी इसकी शाखा प्रशाखा दूर तक फैल गयी। 3 महीने बाद 30 दिसंबर 1906 को ढाका में मुस्लिम लीग की स्थापना के 3 महीने बाद ही अलीगढ के विद्यार्थियों को सम्बोधित करते हुए वकारुल मालिक ने कहा-


साम्प्रदायिकता से विषाक्त अलीगढ कॉलेज की नींव पर ही अलीगढ़ यूनिवर्सिटी खड़ी हुई। अलीगढ़ यूनिवर्सिटी की एक-एक ईंट, वहां के पेड़-पौधों की एक-एक पत्ती में इतना विष भरा है कि उसे जड़ मूल से उखाड़े बिना सांप्रदायिक विद्वेष की भावना को दूर नहीं किया जा सकता। इस्लाम के नाम पर मुसलमानों को राष्ट्रविरोधी बनाने में अलीगढ़ यूनिवर्सिटी का बड़ा हाथ रहा है। अपनी परम्पराओं के अनुरूप यहाँ से शिक्षित दीक्षित मुसलमानों ने 1920-1947 तक जजों कुछ किया उसी के परिणाम स्वरूप 1947 में बंटवारा हुआ। 


मार्च 1947 में वाइसराय बनकर भारत आये माउंट बेटन आने से पहले भारत के धुर विरोधी चर्चिल से मिला। 


 ने उससे कहा-मुझे खेद है कि तुमको भारत को स्वतंत्रता देनी पड़ रही है। मैं यह नहीं कहूंगा कि कैसे देनी है। पर यह अवश्य कहूंगा कि किसी भी मुसलमान का बाल भी बांका नहीं होना चाहिये। ये  ये वो लोग हैं, जो हमारे मित्र है। और ये वो है जिन्हें हिन्दू अब दबा कर रखेगा। इसलिए आपको ऐसे कदम उठाने चाहिए कि हिन्दू ऐसा न कर सकें। 


चर्चिल की सलाह पर भारत का ऐसा विभाजन हुआ कि मुसलमानों को पाकिस्तान के रूप में एक स्वतंत्र देश मिल गया भारत पर उनका पूर्ण अधिकार ज्यों का त्यों बना रह गया। यही हिन्दू मुस्लिम समस्या आज भी ऐसी ही बनी हुई है। आज भी भारत के अधिकांश मुसलमानों के मन में पाकिस्तान के प्रति जो प्यार है।  वो भारत के लिये नहीं है। स्वर्गीय बलराज मधोक ने इंदिरा गाँधी को कभी सलाह दी थी कि अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का डीएवी कॉलेज, लाहौर से बदल देना चाहिये ताकि यह विष वृक्ष सदा के लिए उखड़ जाये। पर इंदिरा गाँधी ने तुष्टिकरण के चलते उनकी सलाह पर ध्यान नहीं दिया।  

      


पाठकों को अंत में एक ही बात कहकर लेख को विराम दूंगा- जिस कौम ने अपने इतिहास से नहीं सीखा। उसका वर्तमान ही नहीं भविष्य भी अंधकारमय होने वाला है। 


[सन्दर्भ ग्रन्थ-स्वामी विद्यानन्द सरस्वती अभिनन्दन ग्रन्थ, डॉ रघुबीर वेदालंकार (संपादक), श्री सत्य सनातन वेद मंदिर, दिल्ली,1995, पृ. 49-52]

Saturday, 22 June 2024

22 जून/बलिदान-दिवस नगर सेठ अमरचन्द बांठिया को फांसी

22 जून/बलिदान-दिवस
नगर सेठ अमरचन्द बांठिया को फांसी
स्वाधीनता समर के अमर सेनानी सेठ अमरचन्द मूलतः बीकानेर (राजस्थान) के निवासी थे। वे अपने पिता श्री अबीर चन्द बाँठिया के साथ व्यापार के लिए ग्वालियर आकर बस गये थे। जैन मत के अनुयायी अमरचन्द जी ने अपने व्यापार में परिश्रम, ईमानदारी एवं सज्जनता के कारण इतनी प्रतिष्ठा पायी कि ग्वालियर राजघराने ने उन्हें नगर सेठ की उपाधि देकर राजघराने के सदस्यों की भाँति पैर में सोने के कड़े पहनने का अधिकार दिया। आगे चलकर उन्हें ग्वालियर के राजकोष का प्रभारी नियुक्त किया।
अमरचन्द जी बड़े धर्मप्रेमी व्यक्ति थे। 1855 में उन्होंने चातुर्मास के दौरान ग्वालियर पधारे सन्त बुद्धि विजय जी के प्रवचन सुने। इससे पूर्व वे 1854 में अजमेर में भी उनके प्रवचन सुन चुके थे। उनसे प्रभावित होकर वे विदेशी और विधर्मी राज्य के विरुद्ध हो गये। 1857 में जब अंग्रेजों के विरुद्ध भारतीय सेना और क्रान्तिकारी ग्वालियर में सक्रिय हुए, तो सेठ जी ने राजकोष के समस्त धन के साथ अपनी पैतृक सम्पत्ति भी उन्हें सौंप दी।
उनका मत था कि राजकोष जनता से ही एकत्र किया गया है। इसे जनहित में स्वाधीनता सेनानियों को देना अपराध नहीं है और निजी सम्पत्ति वे चाहे जिसे दें; पर अंग्रेजों ने राजद्रोही घोषित कर उनके विरुद्ध वारण्ट जारी कर दिया। ग्वालियर राजघराना भी उस समय अंग्रेजों के साथ था।
अमरचन्द जी भूमिगत होकर क्रान्तिकारियों का सहयोग करते रहे; पर एक दिन वे शासन के हत्थे चढ़ गये और मुकदमा चलाकर उन्हें जेल में ठूँस दिया गया। सुख-सुविधाओं में पले सेठ जी को वहाँ भीषण यातनाएँ दी गयीं। मुर्गा बनाना, पेड़ से उल्टा लटका कर चाबुकों से मारना, हाथ पैर बाँधकर चारों ओर से खींचना, लोहे के जूतों से मारना, अण्डकोषों पर वजन बाँधकर दौड़ाना, मूत्र पिलाना आदि अमानवीय अत्याचार उन पर किये गये। अंग्रेज चाहते थे कि वे क्षमा माँग लें; पर सेठ जी तैयार नहीं हुए। इस पर अंग्रेजों ने उनके आठ वर्षीय निरपराध पुत्र को भी पकड़ लिया।
अब अंग्रेजों ने धमकी दी कि यदि तुमने क्षमा नहीं माँगी, तो तुम्हारे पुत्र की हत्या कर दी जाएगी। यह बहुत कठिन घड़ी थी; पर सेठ जी विचलित नहीं हुए। इस पर उनके पुत्र को तोप के मुँह पर बाँधकर गोला दाग दिया गया। बच्चे का शरीर चिथड़े-चिथड़े हो गया। इसके बाद सेठ जी के लिए 22 जून, 1858 को फाँसी की तिथि निश्चित कर दी गयी। इतना ही नहीं, नगर और ग्रामीण क्षेत्र की जनता में आतंक फैलाने के लिए अंग्रेजों ने यह भी तय किया गया कि सेठ जी को 'सर्राफा बाजार' में ही फाँसी दी जाएगी।
अन्ततः 22 जून भी आ गया। सेठ जी तो अपने शरीर का मोह छोड़ चुके थे। अन्तिम इच्छा पूछने पर उन्होंने नवकार मन्त्र जपने की इच्छा व्यक्त की। उन्हें इसकी अनुमति दी गयी; पर धर्मप्रेमी सेठ जी को फाँसी देते समय दो बार ईश्वरीय व्यवधान आ गया। एक बार तो रस्सी और दूसरी बार पेड़ की वह डाल ही टूट गयी, जिस पर उन्हें फाँसी दी जा रही थी। तीसरी बार उन्हें एक मजबूत नीम के पेड़ पर लटकाकर फाँसी दी गयी और शव को तीन दिन वहीं लटके रहने दिया गया। 
सर्राफा बाजार स्थित जिस नीम के पेड़ पर सेठ अमरचन्द बाँठिया को फाँसी दी गयी थी, उसके निकट ही सेठ जी की प्रतिमा स्थापित है। हर साल 22 जून को वहाँ बड़ी संख्या में लोग आकर देश की स्वतन्त्रता के लिए प्राण देने वाले उस अमर हुतात्मा श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। बीकानेर में भी मूर्ति बनकर तैयार है, स्थापना होने की तैयारी ।।

Saturday, 15 June 2024

26 जनवरी/जन्म-दिवस स्वतन्त्रता सेनानी रानी मां गाइडिन्ल्यू

 26 जनवरी/जन्म-दिवस


स्वतन्त्रता सेनानी रानी मां गाइडिन्ल्यू


देश की स्वतन्त्रता के लिए ब्रिटिश जेल में भीषण यातनाएँ भोगने वाली गाइडिन्ल्यू का जन्म 26 जनवरी, 1915 को नागाओं की रांगमेयी जनजाति में हुआ था। केवल 13 वर्ष की अवस्था में ही वह अपने चचेरे भाई जादोनांग से प्रभावित हो गयीं। जादोनांग प्रथम विश्व युद्ध में लड़ चुके थे। 


युद्ध के बाद अपने गाँव आकर उन्होंने तीन नागा कबीलों जेमी, ल्यांगमेयी और रांगमेयी में एकता स्थापित करने हेतु ‘हराका’ पन्थ की स्थापना की। आगे चलकर ये तीनों सामूहिक रूप से जेलियांगरांग कहलाये। इसके बाद वे अपने क्षेत्र से अंग्रेजों को भगाने के प्रयास में लग गयेे।


इससे अंग्रेज नाराज हो गये। उन्होंने जादोनांग को 29 अगस्त 1931 को फाँसी दे दी; पर नागाओं ने गाइडिन्ल्यू के नेतृत्व में संघर्ष जारी रखा। अंग्रेजों ने आन्दोलनरत गाँवों पर सामूहिक जुर्माना लगाकर उनकी बन्दूकें रखवा लीं। 17 वर्षीय गाइडिन्ल्यू ने इसका विरोध किया। वे अपनी नागा संस्कृति को सुरक्षित रखना चाहती थीं। हराका का अर्थ भी शुद्ध एवं पवित्र है। उनके साहस एवं नेतृत्वक्षमता को देखकर लोग उन्हें देवी मानने लगे।


अब अंग्रेज गाइडिन्ल्यू के पीछे पड़ गये। उन्होंने उनके प्रभाव क्षेत्र के गाँवों में उनके चित्र वाले पोस्टर दीवारों पर चिपकाये तथा उन्हें पकड़वाने वाले को 500 रु. पुरस्कार देने की घाषिणा की; पर कोई इस लालच में नहीं आया। अब गाइडिन्ल्यू का प्रभाव उत्तरी मणिपुर, खोनोमा तथा कोहिमा तक फैल गया। नागाओं के अन्य कबीले भी उन्हें अपना नेता मानने लगे।


1932 में गाइडिन्ल्यू ने पोलोमी गाँव में एक विशाल काष्ठदुर्ग का निर्माण शुरू किया, जिसमें 40,000 योद्धा रह सकें। उन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष कर रहे अन्य जनजातीय नेताओं से भी सम्पर्क बढ़ाया। गाइडिन्ल्यू ने अपना खुफिया तन्त्र भी स्थापित  ।


23 जनवरी/जन्म-तिथि नेताजी सुभाषचन्द्र बोस

 23 जनवरी/जन्म-तिथि


नेताजी सुभाषचन्द्र बोस


स्वतन्त्रता आन्दोलन के दिनों में जिनकी एक पुकार पर हजारों महिलाओं ने अपने कीमती गहने अर्पित कर दिये, जिनके आह्नान पर हजारों युवक और युवतियाँ आजाद हिन्द फौज में भर्ती हो गये, उन नेताजी सुभाषचन्द्र बोस का जन्म उड़ीसा की राजधानी कटक के एक मध्यमवर्गीय परिवार में 23 जनवरी, 1897 को हुआ था।


सुभाष के अंग्रेजभक्त पिता रायबहादुर जानकीनाथ चाहते थे कि वह अंग्रेजी आचार-विचार और शिक्षा को अपनाएँ। विदेश में जाकर पढ़ें तथा आई.सी.एस. बनकर अपने कुल का नाम रोशन करें; पर सुभाष की माता श्रीमती प्रभावती हिन्दुत्व और देश से प्रेम करने वाली महिला थीं। वे उन्हें 1857 के संग्राम तथा विवेकानन्द जैसे महापुरुषों की कहानियाँ सुनाती थीं। इससे सुभाष के मन में भी देश के लिए कुछ करने की भावना प्रबल हो उठी।


सुभाष ने कटक और कोलकाता से विभिन्न परीक्षाएँ उत्तीर्ण कीं। फिर पिताजी के आग्रह पर वे आई.सी.एस की पढ़ाई करने के लिए इंग्लैंड चले गये। अपनी योग्यता और परिश्रम से उन्होंने लिखित परीक्षा में पूरे विश्वविद्यालय में चतुर्थ स्थान प्राप्त किया; पर उनके मन में ब्रिटिश शासन की सेवा करने की इच्छा नहीं थी। वे अध्यापक या पत्रकार बनना चाहते थे। बंगाल के स्वतन्त्रता सेनानी देशबन्धु चितरंजन दास से उनका पत्र-व्यवहार होता रहता था। उनके आग्रह पर वे भारत आकर कांग्रेस में शामिल हो गये।


कांग्रेस में उन दिनों गांधी जी और नेहरू की तूती बोल रही थी। उनके निर्देश पर सुभाष बाबू ने अनेक आन्दोलनों में भाग लिया और 12 बार जेल-यात्रा की। 1938 में गुजरात के हरिपुरा में हुए राष्ट्रीय अधिवेशन में वे कांग्रेस के अध्यक्ष बनाये गये; पर फिर उनके गांधी जी से कुछ मतभेद हो गये। गांधी जी चाहते थे कि प्रेम और अहिंसा से आजादी का आन्दोलन चलाया जाये; पर सुभाष बाबू उग्र साधनों को अपनाना चाहते थ ।


22 जनवरी/जन्म-दिवस क्रांतिकारी नृत्यांगना अजीजन बाई

 22 जनवरी/जन्म-दिवस


क्रांतिकारी नृत्यांगना अजीजन बाई


यों तो नृत्यांगना के पेशे को अच्छी नजर से नहीं देखा जाता; पर अजीजन बाई ने सिद्ध कर दिया कि यदि दिल में आग हो, तो किसी भी माध्यम से देश-सेवा की जा सकती है।


अजीजन का जन्म 22 जनवरी, 1824 को मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र में राजगढ़ नगर में हुआ था। उसके पिता शमशेर सिंह बड़े जागीरदार थे। उसका नाम अंजुला रखा गया। एक बार सखियों के साथ हरादेवी मेले में घूमते समय अंग्रेज सिपाहियों ने उसका अपहरण कर लिया। इस दुख में शमशेर सिंह का प्राणान्त हो गया। अंग्रेजों ने उनकी जागीर भी कब्जे में कर ली। कुछ समय तक सिपाही उसके यौवन से खेलते रहे, फिर उसे कानपुर के लाठी मुहाल चकले में 500 रु0 में बेच दिया।


चकले की मालकिन ने उसका नाम अजीजन बाई रखा। इस प्रकार एक हिन्दू युवती मुसलमान बनाकर कोठे पर बैठा दी गयी। मजबूर अजीजन ने समय के साथ समझौता कर पूरे मनोयोग से गीत-संगीत सीखा। इससे उसकी प्रसिद्धि चहुँ ओर फैल गयी। 


उन दिनों सब ओर 1857 की क्रान्ति की तैयारी हो रही थी। 10 मई, 1857 को मेरठ की घटना का समाचार पाकर अजीजन ने 400 वेश्याओं की ‘मस्तानी टोली’ बनाकर उसे अस्त्र-शस्त्र चलाना सिखाकर युद्ध में घायल क्रान्तिकारियों की सेवा में लगा दिया। यह जानकारी नानासाहब, तात्या टोपे आदि तक पहुँची, तो उनके सिर श्रद्धा से नत हो गये।


कहते हैं कि अजीजन बाई तात्या टोपे के प्रति आकर्षित थी; पर जब उसने तात्या का देशप्रेम देखा, तो उसके जीवन की दिशा बदल गयी और वह भी युद्ध के मैदान में उतर गयी। दिन में वह शस्त्र चलाना सीखती और रात में अंग्रेज छावनियों में जाकर उनका दिल बहलाती; पर इसी दौरान वह कई ऐसे रहस्य भी ले आती थी, जो क्रान्तिकारियों के लिए सहायक होते थे। 


अंग्रेजों द्वारा भारतीयों पर किये जा रहे अत्याचारों को देखकर उसका खून खौल उठता था। 15 जुलाई को कानपुर के बीबीघर में अंग्रेज स्  ।


20 जनवरी/बलिदान-दिवस छत्तीसगढ़ के अमर बलिदानी गेंदसिंह

 20 जनवरी/बलिदान-दिवस


छत्तीसगढ़ के अमर बलिदानी गेंदसिंह


छत्तीसगढ़ राज्य का एक प्रमुख क्षेत्र है बस्तर। अंग्रेजों ने अपनी कुटिल था चालों से बस्तर को अपने शिकंजे में जकड़ लिया था। वे बस्तर के वनवासियों का नैतिक, आर्थिक और सामाजिक शोषण कर रहे थे। इससे वनवासी संस्कृति के समाप्त होने का खतरा बढ़ रहा था। अतः बस्तर के जंगल आक्रोश से गरमाने लगे।


उन दिनों परलकोट के जमींदार थे श्री गेंदसिंह। वे पराक्रमी, बुद्धिमान, चतुर और न्यायप्रिय व्यक्ति थे। उनकी इच्छा थी कि उनके क्षेत्र की प्रजा प्रसन्न रहे। उनका किसी प्रकार से शोषण न हो। इसके लिए वे हर सम्भव प्रयास करते थे; पर इस इच्छा में अंग्रेजों के पिट्ठू कुछ जमींदार, व्यापारी और राजकर्मचारी बाधक थे। वे सब उन्हें परेशान करने का प्रयास करते रहते थे।


जब अत्याचारों की पराकाष्ठा होने लगी, तो श्री गंेदसिंह ने 24 दिसम्बर, 1824 को अबूझमाड़ में एक विशाल सभा का आयोजन किया। सभा के बाद गाँव-गाँव में धावड़ा वृक्ष की टहनी भेजकर विद्रोह के लिए तैयार रहने का सन्देश भेजा। 


वृक्ष की टहनी के पीछे यह भाव था कि इस टहनी के पत्ते सूखने से पहले ही सब लोग विद्रोह स्थल पर पहुँच जायें। 4 जनवरी, 1825 को ग्राम, गुफाओं और पर्वत शृंखलाओं से निकल कर वनवासी वीर परलकोट में एकत्र हो गये। सब अपने पारम्परिक अस्त्र-शस्त्रों से लैस थे।


वीर गेंदसिंह ने सबको अपने-अपने क्षेत्र में विद्रोह करने को प्रेरित किया। इससे थोड़े ही समय में पूरा बस्तर सुलग उठा। सरल और शान्त प्रवृत्ति के वनवासी वीर मरने-मारने को तत्पर हो गये। इस विद्रोह का उद्देश्य बस्तर को अंग्रेजी चंगुल से मुक्त कराना था। 


स्थान-स्थान पर खजाना लूटा जाने लगा। अंग्रेज अधिकारियों तथा राज कर्मचारियों को पकड़कर पीटा और मारा जाने लगा। सरकारी भवनों में आग लगा दी गयी। शोषण करने वाले व्यापारियों के गोदाम लूट लिये