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Monday, 20 April 2020

धाराऊ-छत्रपती संभाजी महाराजांची दूध माता

धाराऊ....
छत्रपती संभाजी महाराजांची दूध माता...
या भूतलावर फक्त दोनच वेळेला भाग्यवान आई होण्याचा मान दोन महिलांना प्रत्यक्ष परमेश्वराने दिला...
एक म्हणजे आई यशोदा व दुसरी आई धाराऊ...
एकीने भगवान श्रीकृष्णांना दूध पाजून मोठे केले व दुसरीने स्वराज्याचे धाकले धनी छत्रपती संभाजी महाराजांना दूध पाजून मोठे केले.
धाराऊ तुझे उपकार समस्त महाराष्ट्राची माती व रयत कधीही विसरू शकत नाही.
धाराऊ तुझे पुण्य थोर तू छत्रपती शिवाजी महाराजांच्या छाव्याची दुधाई बनलीस. सहज कुणाच्याही वाट्याला हे पुण्य येत नाही . धाराऊ तु महान आहेस...
शंभुराजे लहान असताना त्यांच्या जन्मदात्या आई महाराणी सईबाई या आजारी पडल्या शंभूराजे यांना आईच्या दुधाची नितांत गरज होती त्यावेळी राजमाता जिजाऊसाहेबांनी पुरंदर गडाच्या पायथ्याशी कापूरहोळ गावातील गाडे पाटील घराण्यातील धाराऊस शंभुराजांची दूध आई आई होण्याचा मान दिला. शंभुराजे अवघे तीन वर्षाचे असताना १६५९ रोजी सईबाई स्वर्गवासी झाल्या शंभुराजे पोरके झाले मात्र धाराऊने आपले मातृत्व शंभुराजाना अर्पण केले.स्वराज्याचे दुसरे धनी धाराऊच्या मायेत वाढले...

bhakt shri bilvmangalji

दक्षिण प्रदेशमें कृष्णबीणा-नदीके तटपर एक ग्राममेँ रामदास नामक एक भगवद्भक्त ब्राह्मण निवास करते थे । उन्हींके पुत्रका नाम था बिल्वमंगल । पिताने यथासाध्य पुत्रको धर्मशास्त्रों शिक्षा दी थी । बिल्वमंगल पिता की शिक्षा तथा उनके भक्तिभावके प्रभावसे बाल्यकालमेँ ही अति शान्त, शिष्ट और श्रद्धावान् हो गया था । परंतु दैवयोगसे पिता-माताके देहावसान होनेपर जबसे घरकी सम्पत्तिपर उसका अधिकार हुआ, तभीसे उसके कुसंगी मित्र जुटने लगे ।
संगदोषसे बिल्वमंगलके अन्त करणमेँ अनेक दोषोंने अपना घर कर लिया । एक दिन गाव में कहीं चिन्तामणि नामकी वेश्याका नाच था, शौकीनोंके दल-के-दल नाचमें जा रहे थे । बिल्वमंगल भी अपने मित्रों के साथ वहाँ जा पहुँचा । वेश्या को देखते ही बिल्वमंगलका मन चंचल हो उठा, बिवेकशून्य बुद्धिने सहारा दिया, बिल्वमंगल डूबा और उसने हाड़-मांसभरे चामके कल्पित रूपपर अपना सर्वस्व न्योछावर कर
दिया-तन, मन, धन, कुल, मान, मर्यादा और धर्म सबको उत्सर्ग कर दिया ! ब्राह्मणकुमारका पूरा पतन हुआ।
सोते-जागते, उठते-बैठते और खाते-पीते सब समय बिल्वमंगलके चिन्तनकी वस्तु केवल एक 'चिन्तामणि'
ही रह गयी।
बिल्वमंगलके पिताका श्राद्ध है, इसलिये आज वह नदीके उस पार चिन्तामणिके घर नहीं जा
श्राद्धकी तैयारी हो रही है। विद्वान् कुलपुरोहित बिल्वमंगलसे श्राद्धके मन्त्रोंकी आवृत्ति करवा रहे हैं, परंतू उसका मन ‘चिन्तामणि' की चिन्तामें निमग्न है। उसे कुछ भी अच्छा नहीं लगता। किसी प्रकार श्राद्ध
समाप्तकर जैसे-तैसे ब्राह्मणोंको झटपट भोजन करवाकर बिल्वमंगल चिन्तामणिके घर जानेको तैयार हूंआ।
सन्ध्या हो चुकी थी, लोगोंने समझाया कि 'भाई! आज तुम्हारे पिताका श्राद्ध है, वेश्याके घर नहीं जाना
चाहिये।' परंतु कौन सुनता था। उसका हृदय तो कभीका धर्म-कर्मसे शून्य हो चुका था। बिल्वमंगल दौड़कर नदीके किनारे पहुँचा। भगवान्की माया अपार है, अकस्मात् प्रबल वेगसे तूफान आया और उसीके साथ मूसलधार वर्षा होने लगी। आकाशमें अन्धकार छा गया, बादलोंकी भयानक गर्जना और बिजलीकी
कड़कड़ाहटसे जीवमात्र भयभीत हो गये। रात-दिन नदीमें रहनेवाले केवटोंने भी नावोंको किनारे बाँधकर
वृक्षोंका आश्रय लिया, परंतु बिल्वमंगलपर इन सबका कोई असर नहीं पड़ा। उसने केवटोंसे उस पार ले
चलनेको कहा, बारम्बार विनती की, उतराईका भी गहरा लालच दिया; परंतु मृत्युका सामना करनेको कौन तैयार होता। सबने इनकार कर दिया। ज्यों-ज्यों बिलम्ब होता था, त्यों-ही-त्यों बिल्वमंगलकी व्याकुलता बढ़ती जाती थी। अन्तमें वह अधीर हो उठा और कुछ भी आगा-पीछा न सोचकर तैरकर पार जानेके लिये सहसा नदीमें कूद पड़ा। भयानक दुःसाहस का कर्म था, परंतु
*_कामातुराणां न भयं न लज्जा।'_*
संयोगवश नदीमें एक मुर्दा बहा जा रहा था। बिल्मवमंगल तो बेहोश था, उसने उसे काठ समझा और उसीके सहारे
नदीके उस पार चला गया। उसे कपड़ोंकी सुध नहीं थी, बिल्कुल दिगम्बर हो गया था, चारों ओर अन्धकार ।
छाया हुआ था, बनैले पशु भयानक शब्द कर रहे थे, कहीं मनुष्यकी गन्ध भी नहीं आती, परंतु बिल्वमंगल
उन्मत्तकी भाँति अपनी धुनमें चला जा रहा था। कुछ ही दूरपर चिन्तामणिका घर था। श्राद्धके कारण आज
बिल्वमंगलके आनेकी बात नहीं थी, अतएव चिन्ता घरके सब दरवाजोंको बन्द करके निश्चिन्त होकर सो
चुकी थी। बिल्वमंगलने बाहरसे बहुत पुकारा; परंतु तूफानके कारण अन्दर कुछ भी नहीं सुनायी पड़ा।
बिल्वमंगलने इधर-उधर ताकते हुए बिजलीके प्रकाशमें दीवालपर एक रस्सा-सा लटकता देखा, तुरंत उसने
उसे पकड़ा और उसीके सहारे दीवाल फाँदकर अन्दर चला गया। चिन्ताको जगाया। वह तो इसे देखते
ही स्तम्भित-सी रह गयी ! सारा शरीर पानीसे भीगा हुआ, भयानक दुर्गन्ध आ रही है। उसने कहा-'तुम
इस भयावनी रातमें नदी पार करके बन्द घरमें कैसे आये?' बिल्वमंगलने काठपर चढ़कर नदी पार होने
और रस्सेकी सहायतासे दीवालपर चढ़नेकी कथा सुनायी ! वष्टि थम चूकी थी। चिन्ता दीपक हाथमें लेकर बाहर आयी, देखती है तो दीवालपर भयानक काला नाग लटक रहा है और नदीके तीर सड़ा मुर्दा पड़ा है। बिल्वमंगलने भी देखा और देखते ही काँप उठा। चिन्ताने भर्त्सना करके कहा-'तू ब्राह्मण है ? अरे
आज तेरे पिताका श्राद्ध था, परंतु एक हाड़-मांसकी पुतलीपर तू इतना आसक्त हो गया कि अपने सारे धर्म
कर्मको तिलांजलि देकर इस डरावनी रातमें मुर्दे और साँपकी सहायतासे यहाँ दौड़ा आया! तू आज
परम सुन्दर समझकर इस तरह पागल हो रहा है, उसका भी एक दिन तो वही परिणाम होनेवाला है, जो
तेरी आँखोंके सामने इस सडे मुर्देका है! धिक्कार है तेरी इस नीच वृत्तिको! अरे! यदि तू इसी प्रकार उस
मनमोहन श्यामसुन्दरपर आसक्त होता-यदि उससे मिलनेके लिये यों छटपटाकर दौड़ता, तो अबतक उसको पाकर तू अवश्य ही कृतार्थ हो चुका होता!'
वेश्याकी वाणीने बड़ा काम किया! बिल्वमंगल चुप होकर सोचने लगा। बाल्यकालकी स्मृति उसके
मनमें जाग उठी। पिताजीकी भक्ति और उनकी धर्मप्राणताके दृश्य उसकी आँखोंके सामने मूर्तिमान् होकर नाचने लगे। बिल्वमंगलकी हृदयतन्त्री नवीन सुरोंसे बज उठी, विवेककी अग्निका प्रादुर्भाव हुआ, भगवत्प्रेमका समद्र उमड़ा और उसकी आँखोंसे अश्रुओंकी अजस्र धारा बहने लगी। बिल्वमंगलने चिन्तामणिके चरण पकड लिये और कहा-'माता! तूने आज मुझको दिव्यदृष्टि देकर कृतार्थ कर दिया।' मन-ही-मन चिन्तामणिको गुरु मानकर प्रणाम किया और उसी क्षण जगच्चिन्तामणिकी चारु चिन्तामें निमग्न होकर उन्मत्तकी भाँति चिन्तामणिके घरसे निकल पड़ा। बिल्वमंगल के जीवन-नाटककी यवनिकाका परिवर्तन हो गया।
दोनोंने उस पूरी रात भगवान्का भजन किया और प्रातः होते ही चिन्तामणिने हरिद्वारकी और
बिल्वमंगलने सन्त श्रीसोमगिरिजी महाराजके आश्रमकी राह ली। वहाँ गुरुदेवसे दीक्षा लेकर एक वर्षतक
आश्रममें ही रहकर भजन-पूजन किया, फिर वृन्दावन धामके लिये चल पड़ा।
श्यामसुन्दरकी प्रेममयी मनोहर मूर्तिका दर्शन करनेके लिये बिल्वमंगल पागलकी तरह जगह-जगह भटकने
लगा। कई दिनोंके बाद एक दिन अकस्मात् उसे रास्तेमें एक परम रूपवती युवती दीख पड़ी, पूर्व-संस्कार अभी
सर्वथा नहीं मिटे थे। युवतीका सन्दर रूप देखते ही नेत्र चंचल हो उठे और नेत्रोंके साथ ही मन भी खिंचा।।
बिल्वमंगलको फिर मोह हुआ। भगवान्को भूलकर वह पुनः पतंग बनकर विषयाग्निको ओर दौडा।
बिल्वमंगल युवतीके पीछे-पीछे उसके मकानतक गया। युवती अपने घरके अन्दर चली गयी, बिल्वमंगल
उदास होकर घरके दरवाजेपर बैठ गया। घरके मालिकने बाहर आकर देखा कि एक मलिनमुख अतिथि
ब्राह्मण बाहर बैठा है। उसने कारण पूछा। बिल्वमंगलने कपट छोड़कर सारी घटना सुना दी और कहा कि
'मैं एक बार फिर उस युवतीको प्राण भरकर देख लेना चाहता हूँ, तुम उसे यहाँ बुलवा दो।' युवती उसी
गृहस्थकी धर्मपत्नी थी, गृहस्थने सोचा कि इसमें हानि ही क्या है; यदि उसके देखनेसे ही इसकी तृप्ति
होती हो तो अच्छी बात है। अतिथिवत्सल गृहस्थ अपनी पत्नीको बुलानेके लिये अन्दर गया। इधर
बिल्वमंगलके मन-समुद्रमें तरह-तरहकी तरंगोंका तूफान उठने लगा।
जो एक बार अनन्यचित्तसे उन अशरण-शरणकी शरणमें चला जाता है, उसके योगक्षेम* का सारा
भार वे अपने ऊपर उठा लेते हैं। आज बिल्वमंगलको सम्हालनेकी भी चिन्ता उन्हींको पड़ी। दीनवत्सल
भगवानने अज्ञानान्ध बिल्वमंगलको दिव्यचक्षु प्रदान किये; उसको अपनी अवस्थाका यथार्थ ज्ञान हुआ, हृदय
शोकसे भर गया और न मालूम क्या सोचकर उसने पासके बेलके पेड़से दो काँटे तोड लिये। इतनेमें ही
गृहस्थकी धर्मपत्नी वहाँ आ पहुँची, बिल्वमंगलने उसे फिर देखा और मन-ही-मन अपनेको धिक्कार देकर
कहने लगा कि 'अभागी आँखें! यदि तुम न होती तो आज मेरा इतना पतन क्यों होता?' इतना कहकर
बिल्वमंगलने उन दोनों काँटोंको दोनों आँखोंमें भोंक लिया! आँखोंसे रुधिरकी अजस्र धारा बहने लगी!
बिल्वमंगल हँसता और नाचता हुआ तुमुल हरिध्वनिसे आकाशको गुंजाने लगा। गृहस्थको और उसकी
पत्नीको बड़ा दुःख हुआ, परंतु वे बेचारे निरुपाय थे। बिल्वमंगलका बचा-खुचा चित्त-मल भी आज सारा
नष्ट हो गया और अब तो वह उस अनाथके नाथको अतिशीघ्र पानेके लिये बडा ही व्याकल हो उठा।
उसके जीवन-नाटकका यह तीसरा पट-परिवर्तन हुआ !
परम प्रियतम श्रीकृष्णके वियोगकी दारुण व्यथासे उसकी फूटी आँखोंने चौबीसों घण्टे आँसूओंकी
झडी लगा दी। न भूखका पता है न प्यासका, न सोनेका ज्ञान है और न जगनेका। 'कष्ण-कष्ण' की
पुकारसे दिशाओंको गुंजारता हुआ बिल्वमंगल जंगल-जंगल और गाँव-गाँवमें घूम रहा है! जिस
दीनबन्धके लिये जान-बूझकर आँखें फोड़ी, जिस प्रियतमको पानेके लिये ऐश-आरामपर लात मारी, वह
मिलने में इतना विलम्ब करे-यह भला, किसीसे कैसे सहन हो? पर 'जो सच्चे प्रेमी होते हैं, वे
प्रेमास्पदके विरहमें जीवनभर रोया करते हैं, सहस्रों आपत्तियोंको सहन करते हैं, परंतु उसपर दोषारोपण
कदापि नहीं करते; उनको अपने प्रेमास्पदमें कभी कोई दोष दीखता ही नहीं!' ऐसे प्रेमीके लिये
प्रेमास्पदको भी कभी चैन नहीं पड़ता। उसे दौड़कर आना ही पड़ता है। आज अन्ध बिल्वमंगल
श्रीकृष्ण-प्रेममें मतवाला होकर जहाँ-तहाँ भटक रहा है। कहीं गिर पड़ता है, कहीं टकरा जाता है,
अन्न-जलका तो कोई ठिकाना ही नहीं। ऐसी दशामें प्रेममय श्रीकृष्ण कैसे निश्चिन्त रह सकते हैं। एक
छोटे-से गोप-बालकके वेषमें भगवान् बिल्वमंगलके पास आकर अपनी मुनि-मनमोहिनी मधुर वाणीसे
बोले,–'सूरदासजी! आपको बड़ी भूख लगी होगी, मैं कुछ मिठाई लाया हूँ, जल भी लाया हूँ; आप इसे
ग्रहण कीजिये।' बिल्वमंगलके प्राण तो बालकके उस मधुर स्वरसे ही मोहे जा चुके थे, उसके हाथका
दुर्लभ प्रसाद पाकर तो उसका हृदय हर्षके हिलोरोंसे उछल उठा! बिल्वमंगलने बालकसे पूछा, 'भैया!
तुम्हारा घर कहाँ है, तुम्हारा नाम क्या है? तुम क्या किया करते हो?'
__बालकने कहा, 'मेरा घर पास ही है, मेरा कोई खास नाम नहीं; जो मुझे जिस नामसे पुकारता है, मैं उसीसे
बोलता हूँ, गौएँ चराया करता हूँ। मुझसे जो प्रेम करते हैं, मैं भी उनसे प्रेम करता हूँ।' बिल्वमंगल बालककी
वीणा-विनिन्दित वाणी सुनकर विमुग्ध हो गया! बालक जाते-जाते कह गया कि 'मैं रोज आकर आपको भोजन
करवा जाया करूँगा।' बिल्वमंगलने कहा, 'बड़ी अच्छी बात है; तुम रोज आया करो।' बालक चला गया और
बिल्वमंगलका मन भी साथ लेता गया। 'मनचोर' तो उसका नाम ही ठहरा! अनेक प्रकारकी सामग्रियोंसे भोग
लगाकर भी लोग जिनकी कृपाके लिये तरसा करते हैं, वही कृपासिन्धु रोज बिल्वमंगलको अपने करकमलोंसे
भॊजन करवाने आते हैं ? धन्य है! भक्तके लिये भगवान् क्या-क्या नहीं करते।
बिल्वमंगल अबतक यह तो नहीं समझा कि मैंने जिसके लिये फकीरीका बाना लिया और आँखोंमें
काट चुभाये, वह बालक यही है; परंतु उस गोप-बालकने उसके हृदयपर इतना अधिकार अवश्य जमा लिया
कि उसको दूसरी बातका सुनना भी असह्य हो उठा। एक दिन बिल्वमंगल मन-ही-मन विचार करने लगा
कि 'सारी आफतें छोड़कर यहाँतक आया, यहाँ यह नयी आफत आ गयी। स्त्रीके मोहसे छूटा तो इस
बालकने मोहमें घेर लिया।' यों सोच ही रहा था कि वह रसिक बालक उसके पास आ बैठा और अपनी
दिवाना बना देनेवाली वाणीसे बोला, 'बाबाजी! चुपचाप क्या सोचते हो? वृन्दावन चलोगे?' वृन्दावनका
नाम सुनते ही बिल्वमंगलका हृदय हरा हो गया, परंतु अपनी असमर्थता प्रकट करता हुआ बोला-'भैया!
मैं अन्धा वृन्दावन कैसे जाऊँ ?' बालकने कहा-'यह लो मेरी लाठी, मैं इसे पकड़े-पकड़े तुम्हारे साथ
चलता हूँ!' बिल्वमंगलका मुख खिल उठा, लाठी पकड़कर भगवान् भक्तके आगे-आगे चलने लगे। धन्य
दयालुता! भक्तकी लाठी पकड़कर मार्ग दिखाते हैं। थोड़ी-सी दूर जाकर बालकने कहा, 'लो! वृन्दावन
आ गया, अब मैं जाता हूँ।' बिल्वमंगलने बालकका हाथ पकड़ लिया, हाथका स्पर्श होते ही सारे शरीरमें
बिजली-सी दौड़ गयी, सात्त्विक प्रकाशसे सारे द्वार प्रकाशित हो उठे, बिल्वमंगलने दिव्य दृष्टि पायी और
उसने देखा कि बालकके रूपमें साक्षात् मेरे श्यामसुन्दर ही हैं। बिल्वमंगलका शरीर रोमांचित हो गया,
आँखोंसे प्रेमाश्रुओंकी अनवरत धारा बहने लगी, भगवान्का हाथ उसने और भी जोरसे पकड़ लिया और
कहा-'अब पहचान लिया है, बहुत दिनोंके बाद पकड़ सका हूँ। प्रभु! अब नहीं छोड़नेका!' भगवान्ने
कहा, 'छोड़ते हो कि नहीं?' बिल्वमंगलने कहा, 'नहीं, कभी नहीं, त्रिकालमें भी नहीं।'
भगवान्ने जोरसे झटका देकर हाथ छुड़ा लिया। भला, जिनके बलसे बलान्वित होकर मायाने सारे
जगत् को पददलित कर रखा है, उसके बलके सामने बेचारा अन्धा क्या कर सकता था! परंतु उसने एक
ऐसी रज्जुसे उनको बाँध लिया था कि जिससे छूटकर जाना उनके लिये बड़ी टेढ़ी खीर थी! हाथ छुड़ाते
ही बिल्वमंगलने कहा-जाते हो? पर स्मरण रखो।
*_हस्तमुत्क्षिप्य यातोऽसि बलात्कृष्ण किमद्भुतम्।_*
*_हृदयाद् यदि निर्यासि पौरुषं गणयामि ते॥_₹
*_हाथ छुड़ाये जात हौ, निबल जानि कै मोहि।_*
*_हिरदै तें जब जाहुगे, सबल बदौंगो तोहि ॥_*
*_भगवान् नहीं जा सके! जाते भी कैसे। प्रतिज्ञा कर चुके हैं-_*
*_ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।।_*
*_(गीता ४।११)_*
*_'जो मुझको जैसे भजते हैं, मैं भी उनको वैसे ही भजता हूँ।'_*
___ भगवान ने बिल्वमंगलकी आँखोंपर अपना कोमल करकमल फिराया, उसकी आँखे खुल गयीं। नेत्रों से
प्रत्यक्ष भगवान् को देखकर-उनकी भुवनमोहिनी अनूप रूपराशिके दर्शन पाकर बिल्वमंगल अपने आपको
सँभाल नहीं सका। वह चरणोंमें गिर पड़ा और प्रेमाश्रुओंसे प्रभुके पावन चरणकमलोंको धोने लगा!
भगवान् ने उठाकर उसे अपनी छातीसे लगा लिया। भक्त और भगवान् के मधुर मिलनसे समस्त जगत् में
मधुरता छा गयी। देवता पुष्पवृष्टि करने लगे। सन्त-भक्तोंके दल नाचने लगे। हरिनामकी पवित्र ध्वनिसे
आकाश परिपूर्ण हो गया। भक्त और भगवान् दोनों धन्य हुए। वेश्या चिन्तामणि, गृहस्थ और उसकी पत्नी
भी वहाँ आ गयीं, भक्त के प्रभावसे भगवान् ने उन सबको अपना दिव्य दर्शन देकर कृतार्थ किया।
*_बिल्वमंगल जीवनभर भक्तिका प्रचार करके भगवान् की महिमा बढ़ाते रहे और अन्तमें गोलोकधाम पधारे।_*

Friday, 17 April 2020

थोरले बाजीराव

थोरले बाजीराव यांना पेशवेपदाची वस्त्रे मिळाली,त्या घटनेला आज 300 वर्ष पूर्ण होत आहे. संपूर्ण हिंदुस्थानवर मराठ्यांचे राज्य निर्माण करणारे बाजीराव हे कुशल सेनानी आणि मुत्सद्दी होते.
पालखेडच्या लढाईत निजामाचा पराभव, मोहम्मदखान बंगशचा पराभव आणि दिल्लीवर पहिली स्वारी करुन शिवछत्रपतींची स्वप्नपुर्ती करणारा पहिला मराठा म्हणजे बाजीराव पेशवा!!
उदयपूरमधील प्रसंग!! बाजीराव उदयपूरला गेले,तेव्हा तेथील महाराणांनी उत्तम स्वागताची तयारी केली.राजसिंहासनाच्या बाजुला तेवढ्याच उंचीचे सिंहासन बाजीरावांसाठी बनवले गेले. बाजीराव दरबारात आले, सर्वांनी जयजयकार केला, महाराणा त्यांना सामोरे गेले आणि शेजारी बसण्याची विनंती केली पण बाजीराव मात्र सिंहासनावर न बसता पायरीवर बसले तेव्हा महाराणा म्हणाले"बाजीरावजी, "क्या हमसे कोई गलती हूई है ,कृपया सिंहासन पर विराजिये!" बाजीराव नम्रतापूर्वक म्हणाले "जी नही महाराज, यह सिंहासन महाराणा प्रताप का सिंहासन है, इसके साथ बैठने की मेरी योग्यता नही है,यह योग्यता तो केवल आपकी और छत्रपती शाहूमहाराज की है,मै तो केवल छत्रपती का एक तुच्छ सेवक हूॅं!!" बाजीरावांच्या शब्दांनी त्यांची कीर्ती आणि आदर अजूनच वाढला.
येथून पुढचा प्रवास जयपुरकडे होता....तिथेही अंबरनरेश बाजीरावांच्या स्वागताची तयारी करत होते.....तिथेही उदयपूरप्रमाणेच दोन सिंहासन!! दरबारात मोठा सोहळा झाला.....मात्र इथे बाजीराव पायरीवर न बसता थेट सिंहासनावर जाऊन बसले.....सोहळा संपला, सोबतच्यां लोकांना संभ्रम झाला की उदयपूर आणि जयपुरला बाजीरावांनी वेगवेगळा व्यवहार का केला असेल? बाजीरावांनी त्यांना उत्तर दिले "उदयपूर अर्थात मेवाड हे महाराणा प्रतापांच्या स्वाभिमानाचे प्रतिक आहे,ज्यांनी कधीही मुघलांसमोर मान झुकवली नाही ,त्या गादीचा भक्तीभावाने आदर राखलाच पाहिजे,पण हे अंबरचे रजपुत राजे! यांनी आपल्या मुली मुघलांना दिल्या,यांचा काय सन्मान करायचा? मेवाड ते मेवाडच!!
अशा प्रतापसूर्य बाजीरावांना छत्रपती थोरल्या शाहूमहाराजांनी मराठा साम्राज्याचा पेशवा म्हणून नियुक्त केले....त्या घटनेला आज तीनशे वर्ष वर्ष पूर्ण होत आहे.
श्री शिवछत्रपतींनी निर्माण केलेल्या हिंदवी स्वराज्याला हिंदवी साम्राज्याकडे घेऊन जाणार्या प्रतापसूर्य बाजीरावांना विनम्र अभिवादन!

चापेकर बंधू हे आद्यक्रांतिकारी

चापेकर बंधू हे आद्यक्रांतिकारी होते. त्यांच्या मध्ये दामोदर हरी चापेकर सर्वात थोरले, यांचा जन्म २५ जून १८६९ आणि त्यांना वीरमरण आले तो दिवस म्हणजे १८ एप्रिल १८९८.
१९व्या शतका अखेरीस पुण्यात प्लेगने थैमान घातले. प्लेगला आळा घालण्याच्या निमित्ताने विल्यम चार्ल्स रॅन्ड या बिटिश अधिकाऱ्याने लोकांचा छळ केला. हिंदूंची घरे उपसून जाळणे, देवघरात जाऊन देवांचा अपमान करणे, तपासणीच्या नावाखाली महिलांशी अभद्र वर्तन करणे, कर्त्या पुरुषांना नामर्दा प्रमाणे हीन वागवणे अशा त्याच्या क्रूर आणि अमानवी कृत्यांमुळे समाजाच्या सर्वच थरांमध्ये संतापाची लाट उसळली. सूडाची ठिणगी मनात पडली आणि धगधगू लागली होती.
राष्ट्र आणि धर्म प्रेमाच्या या जाज्ज्वल्य भावनेतूनच चापेकर बंधू रँडच्या विरोधात पेटून उठले आणि २२ जून १८९७ ला रँडवर पाळत ठेवून चापेकर बंधूं पैकी दामोदरने त्याच्यावर गोळी झाडली. २५ जूनला रँडचा मृत्यू झाला.
अश्या या थोर पराक्रमी बंधू पैकी दामोदर हरी चापेकर यांचा आज स्मृती दिन....
त्यांना विनम्र अभिवादन

समाजसेवी महर्षि कर्वे

समाजसेवी महर्षि कर्वे

महर्षि कर्वे का जन्म 18 अप्रैल, 1858 को महाराष्ट्र के कांेकण क्षेत्र में हुआ था। उनका पूरा नाम धोण्डो केशव पन्त था और वे अण्णा साहब कर्वे के नाम से भी जाने जाते थे। बचपन से ही उनकी पढ़ाई में बहुत रुचि थी।

कक्षा छह की परीक्षा देने के लिए वे अपने गाँव मुरुण्ड से 100 मील दूर सतारा गये; पर दुर्भाग्य से वे अनुत्तीर्ण हो गये। इस पर भी वे निराश नहीं हुए। उन्होंने अगली बार कोल्हापुर से यह परीक्षा दी और उत्तीर्ण हुए।

इसके बाद उच्च शिक्षा के लिए वे मुम्बई आ गये। यहाँ उन्हें बहुत संघर्ष करना पड़ा। खर्च निकालने के लिए उन्हें ट्यूशन पढ़ाने पड़ते थे। उन्होंने 23 वर्ष की अवस्था में मैट्रिक तथा फिर एलफिन्स्टन कालिज से बी.ए. किया।

उनमें छात्र जीवन से ही सेवा एवं परिश्रम की भावना कूट-कूटकर भरी थी। मुम्बई में पढ़ाई पूरी करने के बाद भी वे ट्यूशन एवं छोटे मोटे काम से जीवनयापन करते रहे। उनके पास जैसे ही कुछ पैसा एकत्र होता, वे उसे निर्धन छात्रों एवं अन्य लोगों को दान कर देते थे। इसी बीच उनकी पत्नी का देहान्त हो गया। इसके बाद उन्होंने अपना सारा जीवन समाजसेवा एवं विशेषतः नारी कल्याण में लगाने का निश्चय किया।

प्रो0 गोखले ने उन्हें पुणे के फग्र्युसन कालिज में गणित पढ़ाने के लिए बुलाया। अपने सेवाभाव एवं पढ़ाने की शैली के कारण वे इस काॅलिज के छात्रों में बहुत लोकप्रिय हुए। अब लोग उन पर दूसरे विवाह के लिए दबाव डालने लगे। प्रतिष्ठित नौकरी के कारण अनेक युवतियों के प्रस्ताव भी उन्हें मिले; पर वे समाज में विधवाओं की दशा सुधारना चाहते थे। अतः उन्होंने निश्चय किया कि वे यदि पुनर्विवाह करेंगे, तो किसी विधवा से ही करेंगे। इस प्रकार समाज के प्रबुद्ध वर्ग में वे एक आदर्श उपस्थित करना चाहते थे।

श्री कर्वे ने अपने मित्र नरहरि पन्त की विधवा बहिन आनन्दीबाई से पुनर्विवाह किया। इससे न केवल पुणे अपितु पूरे महाराष्ट्र में हँगामा खड़ा हो गया। उनके ग्राम मुरुण्ड के लोगों ने तो उनका बहिष्कार ही कर दिया; पर वे बिल्कुल भी विचलित नहीं हुए; क्योंकि समाज के अनेक प्रतिष्ठित लोगों का समर्थन उन्हें प्राप्त था। अब वे गाँव और नगरों में भ्रमण कर महिलाओं एवं विधवाओं की स्थिति सुधारने के प्रयास में लग गये।

इसी प्रयास की एक कड़ी के रूप में उन्होंने पुणे के पास हिंगणे में अनाथ बालिकाओं के लिए एक आश्रम बनाया। यद्यपि उनके कार्यों की आलोचना करने एवं उसमें बाधा डालने वालों की भी कमी नहीं थी; पर वे अविचलित रहकर आश्रम के विकास एवं व्यवस्था के लिए निरन्तर भ्रमण करते थे। यहाँ तक कि वे विदेश भी गये और वहाँ से भी धन जुटाकर लाये। उनकी पत्नी भी हर समय उनकी सहायता में तत्पर रहती थी। आगे चलकर उस आश्रम ने एक विश्वविद्यालय का रूप ले लिया।

उनके सेवा कार्यों से प्रभावित होकर लोग उन्हें महर्षि कर्वे के नाम से सम्बोधित करने लगे। अब उनकी बात लोग ध्यान से सुनने लगे। अनेक संस्थाओं एवं विश्वविद्यालयों ने उन्हें मानद उपाधियों से विभूषित किया।
श्री कर्वे ने हरिजन महिलाओं की दशा सुधारने के लिए भी अनेक प्रयास किये। 1958 में उन्हें ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया। 9 नवम्बर, 1962 को 105 वर्ष की आयु में इस समाजसेवी का देहान्त हुआ।

अमर बलिदानी दामोदर हरि चाफेकर

अमर बलिदानी दामोदर हरि चाफेकर

दामोदर हरि चाफेकर उस बलिदानी परिवार के अग्रज थे, जिसके तीनों पुष्पों ने स्वयं को भारत माँ की अस्मिता की रक्षा के लिए बलिदान कर दिया। उनका जन्म 25 जून, 1869 को पुणे में प्रख्यात कथावाचक श्री हरि विनायक पन्त के घर में हुआ था। दामोदर के बाद 1873 में बालकृष्ण और 1879 में वासुदेव का जन्म हुआ। तीनों भाई बचपन से ही अपने पिता के साथ भजन कीर्तन में भाग लेते थे।

दामोदर को गायन के साथ काव्यपाठ और व्यायाम का भी बहुत शौक था। उनके घर में लोकमान्य तिलक का ‘केसरी’ नामक समाचार पत्र आता था। उसे पूरे परिवार के साथ-साथ पास पड़ोस के लोग भी पढ़ते थे। तिलक जी को जब गिरफ्तार किया गया, तो दामोदर बहुत रोये। उन्होंने खाना भी नहीं खाया। इस पर उसकी माँ ने कहा कि तिलक जी ने रोना नहीं, लड़ना सिखाया है। दामोदर ने माँ की वह सीख गाँठ बाँध ली।

अब उन्होंने ‘राष्ट्र हितेच्छु मंडल’ के नाम से अपने जैसे युवकों की टोली बना ली। वे सब व्यायाम से स्वयं को सबल बनाने में विश्वास रखते थे। जब उन्हें अदन जेल में वासुदेव बलवन्त फड़के की अमानवीय मृत्यु का समाचार मिला, तो सबने सिंहगढ़ दुर्ग पर जाकर उनके अधूरे काम को पूरा करने का संकल्प लिया। दामोदर ने शस्त्र संचालन सीखने के लिए सेना में भर्ती होने का प्रयास किया; पर उन्हें भर्ती नहीं किया गया। अब वह अपने पिता की तरह कीर्तन-प्रवचन करने लगे।

एक बार वे मुम्बई गये। वहाँ लोग रानी विक्टोरिया की मूर्ति के सामने हो रही सभा में रानी की प्रशंसा कर रहे थे। दामोदर ने रात में मूर्ति पर कालिख पोत दी और गले में जूतों की माला डाल दी। इससे हड़कम्प मच गया। उन्हीं दिनों पुणे में प्लेग फैल गया। शासन ने मिस्टर रैण्ड को प्लेग कमिश्नर बनाकर वहाँ भेजा। वह प्लेग की जाँच के नाम पर घरों में और जूते समेत पूजागृहों में घुस जाता। माँ-बहनों का अपमान करता। दामोदर एवं मित्रों ने इसका बदला लेने का निश्चय किया। तिलक जी ने उन्हें इसके लिए आशीर्वाद दिया।

22 जून, 1897 को रानी विक्टोरिया का 60वाँ राज्यारोहण दिवस था। शासन की ओर से पूरे देश में इस दिन समारोह मनाये गये। पुणे में भी रात के समय एक क्लब में पार्टी थी। रैण्ड जब वहाँ से लौट रहा था, तो दामोदर हरि चाफेकर तथा उसके मित्रों ने उस पर गोली चला दी। इससे आर्यस्ट नामक अधिकारी वहीं मारा गया। रैण्ड भी बुरी तरह घायल हो गया और तीन जुलाई को अस्पताल में उसकी मृत्यु हो गयी।

पूरे पुणे शहर में हाहाकार मच गया; पर वे पुलिस के हाथ न आये। कुछ समय बाद दो द्रविड़ भाइयों के विश्वासघात से दामोदर और फिर बालकृष्ण पकडे़ गये। जिन्होंने विश्वासघात कर उन्हें पकड़वाया था, वासुदेव और रानाडे ने उन्हें गोली से उड़ा दिया। रामा पांडू नामक पुलिसकर्मी ने अत्यधिक उत्साह दिखाया था, उस पर थाने में ही गोली चलाई; पर वह बच गया।

न्याय का नाटक हुआ और 18 अप्रैल, 1898 को दामोदर को फाँसी दे दी गयी। अन्तिम समय में उनके हाथ में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा लिखित तथा हस्ताक्षरित ग्रन्थ ‘गीता रहस्य’ था। उन्होंने हँसते हुए स्वयं ही फाँसी का फन्दा गले में डाला। आगे चलकर बालकृष्ण, वासुदेव और रानाडे को भी फाँसी पर चढ़ा दिया गया।

Wednesday, 15 April 2020

प्रकृति के अनुपम चितेरे नन्दलाल बोस

प्रकृति के अनुपम चितेरे नन्दलाल बोस

रवीन्द्रनाथ टैगोर और महात्मा गान्धी घनिष्ठ मित्र थे; पर एक बार दोनों में बहस हो गयी। कुछ लोग टैगोर के पक्ष में थे, तो कुछ गान्धी के। वहाँ एक युवा चित्रकार चुप बैठा था। पूछने पर उसने कहा कि चित्रकार को तो सभी रंग पसन्द होते हैं। इस कारण मेरे लिए दोनों में से किसी का महत्त्व कम नहीं है।

यह युवा चित्रकार थे नन्दलाल बोस, जिनके प्राण प्रकृति-चित्रण में बसते थे। उनका जन्म तीन दिसम्बर, 1883 को खड़गपुर, बिहार में पूर्णचन्द्र बोस के घर में हुआ था। वहाँ के नैसर्गिक सौन्दर्य की गहरी छाप उनके बाल हृदय पर पड़ी।

जब उनकी माँ क्षेत्रमणि देवी रंगोली या गुडि़या बनातीं, या कपड़ों पर कढ़ाई करतीं, तो वह उसे ध्यान से देखते थे। इसका परिणाम यह हुआ कि वे पढ़ाई से अधिक रुचि चित्रकला में लेने लगे। जब कक्षा में अध्यापक पढ़ाते थे, तो वे कागजों पर चित्र ही बनाते रहते थे।

उन्हें कला सिखाने वाला जो भी मिलता, वे उसके साथ रम जाते थे। उन्होंने गुडि़या बनाने वालों से यह कला सीखी। एक बार एक पागल ने तीन पैसे लेकर केवल कोयले और पानी से सड़क पर उनका चित्र बना दिया। उन्होंने इसे सीखकर शान्ति निकेतन में इसका प्रयोग किया। 15 वर्ष की अवस्था में वे कोलकाता पढ़ने आ गये; पर फीस के लिए मिला धन वे महान् कलाकारों के चित्र खरीदने में लगा देते थे। अतः कई बार वे अनुत्तीर्ण हुए; पर इससे कला के प्रति उनका अनुराग कम नहीं हुआ।

20 वर्ष की अवस्था में उनका विवाह हो गया। उनके ससुर ने उनकी पढ़ाई की उचित व्यवस्था की। इस दौरान उन्होंने यूरोपीय चित्रकला का अध्ययन किया। उन्होंने प्रसिद्ध चित्रकार अवनीन्द्रनाथ ठाकुर को अपना गुरू बनाया। वे रवीन्द्रनाथ टैगोर के भाई और राजकीय कला विद्यालय के उपप्राचार्य थे। विद्यालय के प्राचार्य श्री हावेल थे।इन दोनों ने उन्हें भारतीय शैली के चित्र बनाने के लिए प्रेरित किया।

यहाँ उन्हांेने अपनी कल्पना से भारतीय देवी, देवताओं तथा प्राचीन ऐतिहासिक घटनाओं के चित्र बनाये, जो बहुत प्रसिद्ध हुए। एक बार भगिनी निवेदिता वैज्ञानिक जगदीशचन्द्र बसु के साथ उनके चित्र देखने आयीं। उन्होंने नन्दलाल जी को अजन्ता गुफाओं के शिल्प के चित्र बनाने हेतु प्रोत्साहित किया तथा उनका परिचय विवेकानन्द और रामकृष्ण परमहंस से कराया।

आगे चलकर देश के बड़े चित्रकारों ने उनकी मौलिक शैली को मान्यता दी। जब ‘इण्डियन सोसायटी अ१फ ओरिएण्टल आटर््स’ की स्थापना हुई, तो उसकी पहली प्रदर्शिनी में उन्हें 500 रु0 का पुरस्कार मिला। उन्होंने इसका उपयोग देश भ्रमण में किया। शान्ति निकेतन में कला विभाग का पदभार सँभालने के बाद उन्होंने रवीन्द्रनाथ टैगोर की अनेक रचनाओं के लिए चित्र बनाये। टैगोर जी उन्हें अपने साथ अनेक देशों की यात्रा पर ले गये।

नन्दलाल बोस के स्वतन्त्रता आन्दोलन से सम्बन्धित चित्र भारतीय इतिहास की अमूल्य धरोहर हैं। इनमें गान्धी जी की ‘दाण्डी यात्रा’ तो बहुत प्रसिद्ध है। संविधान की मूल प्रति का चित्रांकन प्रधानमंत्री नेहरू जी के आग्रह पर इन्होंने ही किया था। स्वतन्त्रता के बाद जब नागरिकों को सम्मानित करने के लिए पद्म अलंकरण प्रारम्भ हुए, तो इनके प्रतीक चिन्ह भी नन्दलाल जी ने ही बनाये। 1954 में वे स्वयं भी ‘पद्मविभूषण’ से सम्मानित किये गये। उन्होंने ‘शिल्प-चर्चा’ नामक एक पुस्तक भी लिखी।

16 अप्रैल  1966 को 83 वर्ष की सुदीर्घ आयु में प्रकृति के अनुपम चितेरे इस कला मनीषी का देहान्त हुआ।

Monday, 13 April 2020

वीर खाज्या एवं दौलतसिंह नायक

वीर खाज्या एवं दौलतसिंह नायक

खाज्या नायक अंग्रेजों की भील पल्टन में एक सामान्य सिपाही थे। उन्हें सेंधवा-जामली चैकी से सिरपुर चैक तक के 24 मील लम्बे मार्ग की निगरानी का काम सौंपा गया था। खाज्या ने 1831 से 1851 तक इस काम को पूर्ण निष्ठा से किया।

एक बार गश्त के दौरान उन्होंने एक व्यक्ति को यात्रियों को लूटते हुए देखा। इससे वह इतने क्रोधित हो गये कि बिना सोचे-समझे उस पर टूट पड़े। इससे उस अपराधी की मृत्यु हो गयी। शासन ने कानून अपने हाथ में लेने पर उन्हें दस साल की सजा सुनायी।

किन्तु कारावास में अनुशासित रहने के कारण उनकी सजा घटा कर पाँच साल कर दी गयी। जेल से छूट कर उन्होंने शासन से फिर अपने लिए नौकरी माँगी; पर उन्हें नौकरी नहीं दी गयी। इससे वह शासन से नाराज हो गये और उनसे बदला लेने का सही समय तलाशने लगे।

इतिहासकार डा. एस.एन.यादव के अनुसार जब 1857 में भारत में अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह भड़क उठा, तो अंग्रेज अधिकारियों ने खाज्या और अनेक पूर्व सैनिक व सिपाहियों को फिर से काम पर रख लिया; पर खाज्या के मन में अंग्रेज शासन के प्रति घृणा बीज तो अंकुरित हो ही चुका था।

वह शान्त भाव से फिर काम करने लगे; लेकिन अब उनका मन काम में नहीं लगता था। एक बार एक छोटी सी भूल पर अंग्रेज अधिकारी कैप्टेन बर्च ने उन्हें अपमानित किया। उनके रूप, रंग और जातीय अस्मिता पर बहुत खराब टिप्पणियाँ कीं। अब खाज्या से और सहन नहीं हुआ। उन्होंने नौकरी से त्यागपत्र दे दिया।

उनके मन में प्रतिशोध की भावना इतनी प्रबल थी कि वह बड़वानी (मध्य प्रदेश) क्षेत्र के क्रान्तिकारी नेता भीमा नायक से मिले, जो रिश्ते में उनके बहनोई लगते थे। यहीं से इन दोनों की जोड़ी बनी, जिसने भीलों की सेना बनाकर निमाड़ क्षेत्र में अंग्रेजों के विरुद्ध वातावरण खड़ा कर दिया।

भील लोग शिक्षा और आर्थिक रूप से तो बहुत पीछे थे; पर उनमें वीरता और महाराणा प्रताप के सैनिक होने का स्वाभिमान कूट-कूटकर भरा था। जब एक बार ये अंग्रेजों के विरुद्ध खड़े हो गये, तो फिर पीछे हटने का कोई प्रश्न ही नहीं था।

इस सेना ने अंग्रेजों के खजाने लूटे, उनका वध किया और अंग्रेजों के पिट्ठुओं को भी नहीं बख्शा। शासन ने इन्हें गिरफ्तार करने के अनेक प्रयास किये; पर जंगल और घाटियों के गहरे जानकार होने के कारण वीर भील योद्धा मारकाट कर सदा बचकर निकल जाते थे।

अब शासन ने भेद नीति का सहारा लेकर इन दोनों भील नायकों को पकड़वाने वाले को एक हजार रु. का पुरस्कार घोषित कर दिया। तब के एक हजार रु. आज के दस लाख रु. के बराबर होंगे। फिर भी भीमा और खाज्या नायक बिना किसी भय के क्षेत्र में घूम-घूमकर लोगों को संगठित करते रहे।

11 अप्रैल, 1858 को बड़वानी और सिलावद के बीच स्थित आमल्यापानी गाँव में अंग्रेज सेना और इस भील सेना की मुठभेड़ हो गयी। अंग्रेज सेना के पास आधुनिक शस्त्र थे, जबकि भील अपने परम्परागत शस्त्रों से ही मुकाबला कर रहे थे। प्रातः आठ बजे से शाम तीन बजे तक यह युद्ध चला। इसमें खाज्या नायक के वीर पुत्र दौलतसिंह सहित अनेक योद्धा बलिदान हुए।

आज भी सारा निमाड़ क्षेत्र उस वीरों के प्रति श्रद्धा से नत होता है, जिन्होंने अपने राष्ट्रीय स्वाभिमान के लिए प्राणाहुति दी।

स्वधर्म के सेनानी एच.अण्डरसन मावरी

स्वधर्म के सेनानी एच.अण्डरसन मावरी

पूर्वोत्तर भारत में धर्मान्तरण के महाराक्षसों से लड़ने वाले स्वधर्म के कर्मठ सेनानी श्री एच.अंडरसन मावरी का जन्म 12 अप्रैल, 1920 को शिलांग (मेघालय) के लेटुमखराह ग्राम में हुआ था। जब वे 10 वर्ष के थे, तब उनके पूरे परिवार को ईसाई बना लिया गया।

इंटर की परीक्षा उत्तीर्ण कर वे 1943 में सेना में भर्ती हो गये। द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद 1946 में सेना से अवकाश लेकर उन्होंने फिर अध्ययन प्रारम्भ किया तथा गोहाटी वि.वि. से बी.ए. कर शिलांग के शासकीय हाईस्कूल में अध्यापक हो गये।

इस दौरान उन्होंने ईसाई मजहब के प्रचार-प्रसार में काफी समय लगाया। कई जगह वे प्रवचन करने जाते थे; पर इससे उन्हें आध्यात्मिक तृप्ति नहीं हुई। अतः 1966 में नौकरी छोड़कर दर्शन एवं धर्मशास्त्र का अध्ययन करने के लिए उन्होंने श्रीरामपुर (कोलकाता) के थियोलाॅजिकल काॅलिज में प्रवेश ले लिया। एक वर्ष बाद वे चेरापूंजी के विद्यालय में प्रधानाचार्य हो गये।

इस दौरान उन्होंने विभिन्न धर्मों की तुलना, आदिधर्म एवं चर्च के इतिहास का गहन अध्ययन किया। इससे उन्हें अनुभव हुआ कि ईसाई पादरी जिस खासी धर्म की आलोचना करते हैं, वह तो एक श्रेष्ठ धर्म है। इसकी तुलना में ईसाई मजहब कहीं नहीं ठहरता। अतः 1968 में उन्होंने ईसाई मजहब छोड़कर स्वयं को अपने पूर्वजों के पवित्र खासी धर्म की सेवार्थ समर्पित कर दिया। वे अपने गांव लौट आये और वहां पर ही एक हाईस्कूल के प्राचार्य हो गये।

अब उन्होंने समाचार पत्रों में लेखन भी प्रारम्भ कर दिया। खासी जाति की अवस्था पर इनकी पहली पुस्तक ‘का परखात ऊ खासी’ प्रकाशित हुई। इसके बाद तो खासी एवं स्वधर्म, खासी धर्मसार, भविष्य की झलक, पूर्वी बनाम पश्चिमी संस्कृति तथा अन्य कई लघु पुस्तिकाएं छपीं। स्थानीय भाषा-बोली के साथ ही उनका अंग्रेजी में भी अनुवाद हुआ।

उन्होंने स्वामी विवेकानंद की जीवनी भी लिखी। अब वे गांव-गांव में जाकर खासी धर्म का प्रचार करने लगे। इससे जहां एक ओर खासी जाति का खोया हुआ स्वाभिमान वापस आया, वहां ईसाई षड्यन्त्रों के विफल होने से पादरियों में हलचल मच गयी।

छह मार्च, 1978 को श्री मावरी मेघालय तथा बांगलादेश की सीमा पर स्थित ग्राम नोंगतालांग में आयोजित ‘सेंग खासी सम्मेलन’ में शामिल हुए। उसके बाद से वे खासी जाति के उत्थान के लिए खासी जयन्तिया पहाडि़यों में घूम-घूम कर ‘स्वधर्मों निधनम् श्रेय, परमधर्मो भयावह’ की अलख जगा रहे हैं।

उनके प्रयासों से खासी जाति संगठित हुई तथा ईसाइयों के चंगुल में फंसे हजारों लोग वापस अपने धर्म में लौट आये। उनकी सक्रियता देखकर लोगों ने उन्हें खासी जाति की प्रमुख संस्था ‘सेंग खी लांग’ का अध्यक्ष बना दिया।

पूर्वोत्तर में सघन प्रवास से उनकी ख्याति भारत के साथ ही विदेशों तक जा पहुंची। 1981 में हालैंड तथा बेल्जियम में आयोजित विश्व धर्म सभाओं में श्री मावरी ने खासी धर्म की महत्ता पर प्रभावी व्याख्यान दिये। मेघालय में हिन्दू धर्म तथा स्थानीय जनजातियों की भाषा, बोली, रीति-रिवाज तथा परम्पराओं की रक्षार्थ काम करने वाली विश्व हिन्दू परिषद, वनवासी कल्याण आश्रम आदि संस्थाओं के विचारों से प्रभावित होकर उनकी यह धारणा दृढ़ हुई है कि सेंगखासी आंदोलन विराट हिन्दू धर्म के पुनर्जागरण का ही एक प्रयास है।

अब श्री मावरी पूरे देश के वनवासियों के बीच जाकर उन्हें ईसाइयों के षड्यन्त्रों से सावधान करते हैं। यद्यपि ईसाई मिशनरियों को देश तथा विदेश से भारी सहायता मिलती है, उनके संसाधनों का मुकाबला करना कठिन है। फिर भी श्री मावरी को विश्वास है कि अंतिम विजय सत्य की ही होगी।

कृषि वैज्ञानिक सर गंगाराम

कृषि वैज्ञानिक सर गंगाराम

श्री गंगाराम का जन्म 13 अप्रैल, 1851 को मंगटानवाला (वर्तमान पाकिस्तान) में हुआ था। वे बचपन से ही होनहार विद्यार्थी थे। अपनी सभी परीक्षाएँ प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कर वे पंजाब के सार्वजनिक निर्माण विभाग (पी.डब्ल्यू.डी.) में अभियन्ता के रूप में काम करने लगे।
इस दौरान पूर्ण निष्ठा एवं परिश्रम से काम करते हुए उन्होंने शासन-प्रशासन के कार्यों में अच्छी दक्षता प्राप्त की। नगर और ग्रामीण क्षेत्र में लागू की गयी उनकी योजनाएं पूरे देश में आदर्श मानी जाती थीं। उनकी देखरेख और नेतृत्व में निर्मित रेनाला जल विद्युतगृह आज भी पाकिस्तान की सेवा कर रहा है।

एक अभियन्ता होते हुए भी उनका सर्वाधिक योगदान कृषि क्षेत्र के लिए है। उनकी मान्यता थी कि भारत मूलतः कृषि प्रधान देश है, अतः खेती की उन्नति से ही भारत उन्नति कर सकता है। उन्होंने अपनी योजना एवं प्रयोगों को अविभाजित पंजाब में लागू किया। जिस प्रयोग के लिए शासन-प्रशासन ने उन्हें अनुमति नहीं दी, उसमें उन्होंने व्यक्तिगत रूप से रुचि ली और उसे सफल करके दिखाया। इससे शासन भी उनकी बातें मानने को विवश हुआ।

पंजाब के सूखे क्षेत्रों में श्री गंगाराम ने नहरों का जाल बिछाकर सिंचाई का समुचित प्रबन्ध किया। उन्होंने शासन से मिंटगुमरी जिले में 50,000 एकड़ (200 वर्ग कि.मी.) बंजर एवं असिंचित भूमि पट्टे पर लेकर उसमें अथक परिश्रम किया।

खेती एवं सिंचाई की आधुनिक विधियों के प्रयोग से वहां तीन वर्ष में फसल लहलहाने लगी। आज देश में सर्वाधिक औसत आय पंजाब की ही है। इसका श्रेय बहुत मात्रा में श्री गंगाराम जी को ही है। उनकी उपलब्धियों को देखते हुए अंग्रेज शासन ने उन्हें ‘सर’ की उपाधि से सम्मानित किया।

आर्थिक क्षेत्र में सफल होने के बाद सर गंगाराम ने सामाजिक क्षेत्रों में सुधार के प्रयास किये। उन्होंने भारत और विशेषकर पंजाब में फैली हर कुरीति एवं सामाजिक रूढ़ी का प्रखर विरोध किया। कोढ़ की तरह समाज को खा रही दहेज प्रथा और बाल-विवाह के विरुद्ध उन्होंने आवाज उठाई। वह विधवा विवाह के प्रबल समर्थक थे। साक्षरता के लिए भी उनके प्रयास सराहनीय हैं।

श्री गंगाराम किसी एक क्षेत्र, धर्म या जाति की बजाय संपूर्ण मानवता के प्रेमी थे। खेती से प्राप्त प्रचुर धन उन्होंने समाजहित में खर्च किया। वे अपने वेतन का अधिकांश भाग धर्मार्थ और सामाजिक संस्थाओं को दे देते थे। इसीलिए जनता उन्हें ‘दानवीर’ कहती थी।

लाहौर का गंगाराम अस्पताल जनता की सेवा में अग्रणी है। उन्होंने लाहौर में माॅडल टाउन का विकास किया, जहां रहने में लोग गर्व का अनुभव करते हैं। पठानकोट और अमृतसर के बीच रेल लाइन, लाहौर का मुख्य डाकघर, संग्रहालय तथा कई अन्य महत्वपूर्ण भवनों का निर्माण उन्होंने ही किया। लाहौर के माल रोड पर उनकी मूर्ति स्थापित की गयी थी।

उन्होंने सेवा कार्यों के लिए ‘गंगाराम न्यास’ स्थापित कर इसके माध्यम से छात्र एवं छात्राओं के लिए अनेक विद्यालय तथा अनाथ बच्चों के लिए आवास बनवाये। पंजाब के तत्कालीन गवर्नर सर मेल्कम हेली ने कहा था कि उन्होंने एक नायक की तरह धन कमाया और संत की तरह उसे दान कर किया। 1947 में देश विभाजन के बाद उनके परिजनों ने दिल्ली में उनकी स्मृति में गंगाराम न्यास बनाया, जो सर गंगाराम अस्पताल का संचालन करता है।

इस महान विद्वान वैज्ञानिक एवं समाजसेवी का लन्दन में 10 जुलाई, 1927 को देहान्त हुआ। अंतिम संस्कार के बाद उनके भस्मावशेष गंगा और उनकी कर्मभूमि लाहौर के पास रावी नदी में विसर्जित कर दिये गये।

अनुपम क्रान्तितीर्थ जलियांवाला बाग

अनुपम क्रान्तितीर्थ जलियांवाला बाग

भारतीय स्वतन्त्रता के लिए हुए संघर्ष के गौरवशाली इतिहास में अमृतसर के जलियाँवाला बाग का अप्रतिम स्थान है। इस आधुनिक तीर्थ पर हर देशवासी का मस्तक उन वीरों की याद में स्वयं ही झुक जाता है, जिन्होंने अपने रक्त से भारत की स्वतन्त्रता के पेड़ को सींचा।

13 अप्रैल, 1919 को बैसाखी का पर्व था। यों तो इसे पूरे देश में ही मनाया जाता है; पर खालसा पन्थ की स्थापना का दिन होने के कारण पंजाब में इसका उत्साह देखते ही बनता है। इस दिन जगह-जगह मेले लगते हैं, लोग पवित्र नदियों में स्नान कर पूजा करते हैं; पर 1919 में इस पर्व पर वातावरण दूसरा ही था। इससे पूर्व अंग्रेज सरकार ने भारतीयों के दमन के लिए ‘रौलट एक्ट’ का उपहार दिया था। इसी के विरोध में एक विशाल सभा अमृतसर के जलियाँवाला बाग में आयोजित की गयी थी।

यह बाग तीन ओर से दीवार से घिरा था और केवल एक ओर से ही आने-जाने का बहुत छोटा सा मार्ग था। सभा की सूचना मिलते ही जनरल डायर अपने 90 सशस्त्र सैनिकों के साथ वहाँ आया और उसने उस एकमात्र मार्ग को घेर लिया। इसके बाद उसने बिना चेतावनी दिये निहत्थे स्त्री, पुरुष, बच्चों और वृद्धों पर गोली चला दी। यह गोलीवर्षा 10 मिनट तक होती रही।

सरकारी रिपोर्ट के अनुसार इसमें 379 लोग मरे तथा 1,208 घायल हुए; पर सही संख्या 1,200 और 3,600 है। सैकड़ों लोग भगदड़ में दब कर कुचले गये और बड़ी संख्या में लोग बाग में स्थित कुएँ में गिर कर मारे गये।

इस नरसंहार के विरोध में पूरे देश का वातावरण गरम हो गया। इसके विरोध में पूरे देश में धरने और प्रदर्शन हुए। सरकारी जाँच समिति ‘हंटर कमेटी’ के सामने इस कांड के खलनायक जनरल डायर ने स्वयं स्वीकार किया कि ऐसी दुर्घटना इतिहास में दुर्लभ है। जब उससे पूछा गया कि उसने ऐसा क्यों किया ? तो उसने कहा कि उसे शक्ति प्रदर्शन का यह समय उचित लगा।

उसने यह भी कहा कि यदि उसके पास गोलियाँ समाप्त न हो गयी होतीं, तो वह कुछ देर और गोली चलाता। वह चाहता था कि इतनी मजबूती से गोली चलाए, जिससे भारतीयों को फिर शासन का विरोध करने की हिम्मत न हो। उसने इसके लिए डिप्टी कमिश्नर की आज्ञा भी नहीं ली।

जब उससे पूछा गया कि उसने गोलीवर्षा के बाद घायलों को अस्पताल क्यों नहीं पहुँचाया, तो उसने लापरवाही से कहा कि यह उसका काम नहीं था। विश्वकवि रवीन्द्र नाथ ठाकुर ने इस नरसंहार के विरोध में अंग्रेजों द्वारा प्रदत्त ‘सर’ की उपाधि लौटा दी।

भारी विरोध से घबराकर शासन ने 23 मार्च, 1920 को जनरल डायर को बर्खास्त कर इंग्लैंड भेज दिया, जहां अनेक शारीरिक व मानसिक व्याधियों से पीडि़त होकर 23 जुलाई, 1927 को उसने आत्महत्या कर ली।

इस कांड के समय पंजाब में माइकेल ओडवायर गवर्नर था। जनरल डायर के सिर पर उसका वरदहस्त रहता था। 28 मई, 1919 को गवर्नर पद से मुक्त होकर वह भी इंग्लैंड चला गया। वहाँ उसके प्रशंसकों ने उसे सम्मानित कर एक अच्छी धनराशि भेंट की। उसने भारत के विरोध में एक पुस्तक भी लिखी।

पर भारत माँ वीर प्रसूता है। क्रान्तिवीर ऊधमसिंह ने लन्दन के कैक्सटन हाॅल में 13 मार्च, 1940 को माइकेल ओडवायर के सीने में गोलियां उतार कर इस राष्ट्रीय अपमान का बदला लिया। इस बाग में दीवारों पर लगे गोलियों के निशान आज भी उस क्रूर जनरल डायर की याद दिलाते हैं, जबकि वहाँ स्थित अमर शहीद ज्योति हमें देश के लिए मर मिटने को प्रेरित करती है।

विचार, वाणी और कलम के धनी रामशंकर अग्निहोत्री

विचार, वाणी और कलम के धनी रामशंकर अग्निहोत्री


श्री रामशंकर अग्निहोत्री का जन्म मध्य प्रदेश के सिवनी-मालवा क्षेत्र के होशंगाबाद जिले में 14 अपै्रल, 1926 को हुआ था। बचपन से ही शाखा और लेखन के प्रति रुझान के कारण वे प्रचारक तथा पत्रकार बने।

कांग्रेस द्वारा मुस्लिम तुष्टीकरण तथा विभाजन की बन रही परिस्थिति के बीच शिक्षा अधूरी छोड़कर 1944 में वे प्रचारक बन गये। प्रारम्भ में उन्हें मंडला जिला प्रचारक बनाया गया। 1949 में वे अ0भा0विद्यार्थी परिषद की महाकौशल इकाई के संगठन मंत्री तथा 1951 में विंध्य प्रदेश जनसंघ के संगठन मंत्री रहे।

इसी बीच उन्होंने सागर वि.वि. से स्नातक एवं नागपुर वि.वि. से पत्रकारिता में डिप्लोमा प्राप्त कर लिया। 1956 से 1964 तक वे महाकौशल प्रांत प्रचारक रहे। इस दौरान उन्होंने बड़ी संख्या में मेधावी युवकों को संघ कार्य में जोड़ा। इनमें से एक श्री सुदर्शन जी आगे चलकर सरसंघचालक बने।

1964 में उन्हें लखनऊ भेजा गया। वहां उन्होंने ‘राष्ट्रधर्म’ मासिक पत्रिका को पुनर्जीवित किया और 1968 तक उसके सम्पादक रहे। इसके बाद उन्होंने पांचजन्य, युगवार्ता, दैनिक युगधर्म, हिन्दुस्थान समाचार, सांध्य दैनिक आकाशवाणी आदि अनेक पत्र-पत्रिकाओं का सम्पादन किया।

इस बीच वे ‘कश्मीर सत्याग्रह’ में भी सक्रिय रहे। आपातकाल में बनी एकीकृत समाचार संस्था के भी वे उप सम्पादक थे। 1971 में भारत-पाक युद्ध के समय वे पश्चिमी क्षेत्र के युद्ध संवाददाता रहे। 1981 से 83 तक वे नेपाल में भी विशेष संवाददाता रहे। इस प्रकार पत्रकारिता के हर क्षेत्र में उन्होंने विशेषज्ञता सिद्ध की।

1990 में जब ‘श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन’ ने जोर पकड़ा, तो उन्हें इसके समाचार दुनिया भर में तेजी से प्रसारित करने की जिम्मेदारी दी गयी। प्रारम्भ में वे दिल्ली में ‘श्रीराम कारसेवा समिति, सूचना केन्द्र’ के निदेशक रहे। इसके बाद वे अयोध्या के ‘श्रीराम जन्मभूमि मीडिया केन्द्र’ के निदेशक तथा फिर लखनऊ में ‘मीडिया फोरम फीचर्स’ के सम्पादक रहे। इन सब स्थानों पर उन्होंने पत्रकार जगत को सही एवं अद्यतन सूचनाएं देने का व्यापक तंत्र खड़ा किया।

रामशंकर जी की संघ, जनसंघ और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व से अच्छी मित्रता थी। अतः जहां उनकी आवश्यकता होती, उन्हें बुला लिया जाता था। 1999 से 2002 तक वे दिल्ली में भाजपा के केन्द्रीय मीडिया प्रकोष्ठ से सम्बद्ध रहे। फिर उन्होंने ‘मीडिया वाॅच’ का सम्पादन और प्रकाशन भी किया।

पत्रकार के नाते उन्होंने तंजानिया, कोरिया, युगांडा, इथोपिया, नेपाल, बांग्लादेश, पाकिस्तान और इंग्लैंड की यात्राएं कीं। रामशंकर जी को उनकी उपलब्धियों के लिए कई मान-सम्मान दिये गये। इनमें डा. नगेन्द्र पुरस्कार, स्व. बापूराव लेले स्मृति सम्मान, लाला बल्देव सिंह सम्मान तथा म.प्र. शासन द्वारा माणिकचंद वाजपेयी राष्ट्रीय पत्रकारिता पुरस्कार प्रमुख हैं।

रामशंकर जी प्रवास और भागदौड़ के बीच भी लिखने का समय निकाल लेते थे। उनके काव्य संग्रह ‘सत्यम् एकमेव’ के साथ ही कश्मीर के मोर्चे पर, राष्ट्र जीवन की दिशा, बाजीप्रभु देशपांडे, सुरक्षा के मोर्चे पर, अविस्मरणीय बाबासाहब आप्टे, कम्युनिस्ट विश्वासघात की कहानी, डा0 हेडगेवार: एक चमत्कार और नया मसीहा जैसी पुस्तकें भी बहुत लोकप्रिय हुईं।

विचार, वाणी और लेखनी के धनी श्री रामशंकर जी एक ध्येयनिष्ठ स्वयंसेवक थे। 1947 के बाद कांग्रेस और वामपंथ की चाटुकार पत्रकारिता के दौर में भी उन्होंने आचरण की शुद्धता और राष्ट्रवादी तेवर बनाये रखे। सात जुलाई, 2010 को छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में हृदयगति रुकने से उनका देहांत हुआ। 85 वर्ष की इस आयु में भी वे कुशाभाऊ ठाकरे वि.वि. के ‘मानव अध्ययन शोधपीठ’ के निदेशक और अध्यक्ष की जिम्मेदारी निभा रहे थे।

मोइरांग, जहां नेताजी ने तिरंगा फहराया

मोइरांग, जहां नेताजी ने तिरंगा फहराया

सुन्दर पर्वतमालाओं से घिरे मणिपुर की राजधानी इम्फाल से 45 कि.मी दक्षिण में लोकताक झील के किनारे मोइरांग नामक छोटा सा नगर बसा है। भारतीय स्वाधीनता समर में इसका विशेष महत्व है। यहीं पर 14 अप्रैल, 1944 को आजाद हिन्द फौज के संस्थापक नेता जी सुभाषचन्द्र बोस ने सर्वप्रथम तिरंगा झण्डा फहराया था। उन्होंने मोइरांग पर कब्जा कर यहाँ के डाक बंगले को आजाद हिन्द फौज का मुख्यालय बना लिया था।

इस घटना की स्मृति में मोइरांग में ‘आई.एन.ए. युद्ध संग्रहालय’ बनाया गया है। इसमें प्रवेश करते ही बायीं ओर सैन्य वेश में नेता जी भव्य मूर्ति स्थापित है। इसे देखकर लगता है कि वे स्वाधीनता संघर्ष के मुख्य सेनापति थे। यह बात दूसरी है कि गांधी जी व प्रधानमन्त्री नेहरु से वैचारिक मतभेद होने के कारण भारतीय इतिहास में उन्हें समुचित स्थान नहीं मिल सका।

संग्रहालय में दायीं ओर संगमरमर पत्थर से निर्मित एक चबूतरा है। उस पर अंग्रेजी में लिखा है - वह स्थल, जहाँ सुभाषचन्द्र बोस ने सर्वप्रथम तिरंगा फहराया था। उससे कुछ दूरी पर संगमरमर से ही बना एक स्मृति स्तम्भ और है, जिस पर आजाद हिन्द फौज के तीन आदर्श - अवसर, विश्वास और बलिदान उत्कीर्ण हैं। यह उस स्तम्भ की प्रतिकृति है, जिसे नेताजी ने 8 जुलाई, 1945 को आजाद हिन्द सरकार की स्मृति में सिंगापुर में बनाया था।

सिंगापुर जब फिर से अंग्रेजों के कब्जे में आया, तो उन्होंने उस स्मारक को तोड़ दिया; पर नेताजी के वीर सैनिकों के मन में बसे स्मारक को वे नहीं तोड़ सके। अतः सैनिकों ने वैसा ही स्मारक मोइरांग में फिर से बना लिया। उस पर लिखा है - आजाद हिन्द फौज के बलिदानियों की स्मृति में इस स्मारक की नींव नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने 8 जुलाई, 1945 को रखी।

इसका उद्घाटन प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गांधी ने 23 सितम्बर, 1969 को किया था। बंगाल शासन द्वारा प्रदत्त नेताजी की प्रतिमा का विधिवत अनावरण 21 अक्तूबर, 1970 को किया गया था।

संग्रहालय की अलमारियों में नेताजी द्वारा मोइरांग के लिए लड़े गये निर्णायक युद्ध के अनेक दुर्लभ चित्र लगाये गये हैं। समय-समय पर उनके द्वारा कहे गये प्रेरक वाक्य तथा आजादी का घोषणा पत्र भी वहाँ सुसज्जित है। यहाँ आजाद हिन्द फौज के अन्तर्गत काम करने वाली ‘रानी झाँसी रेजिमेण्ट’ के भी अनेक चित्र हैं।

कुछ चित्रों में नेताजी सलामी ले रहे हैं, तो कहीं वे टैंक ब्रिगेड का निरीक्षण कर रहे हैं। आग उगलते युद्धक्षेत्र के अग्रिम मोर्चे पर उन्हें सैनिकों का उत्साह बढ़ाते देखकर रक्त का संचार तेज हो जाता है। एक चित्र में वे स्वयं कार्बाइन हाथ में लिये युद्ध की मुद्रा में खड़े हैं।

इन चित्रों और युद्ध के नक्शों को देखकर स्पष्ट होता है कि स्वाधीनता संग्राम में जहाँ तथाकथित बड़े कांग्रेसी नेता सुविधा सम्पन्न बंगलों में नजरबन्दी का सुख भोग रहे थे, वहाँ नेताजी जंगलों और पहाड़ों में ठोकरें खाकर लोगों को संगठित कर रहे थे। वे जनता को खून के बदले आजादी देने का आश्वासन भी दे रहे थे।

मोइरांग से 30 कि.मी. की दूरी पर ‘खूनी पर्वत’ है। यहाँ द्वितीय विश्व युद्ध के समय जापान और ब्रिटिश सेनाओं में घमासान हुआ था, जिसमें बड़ी संख्या में दोनों ओर के सैनिक मारे गये थे। मोइरांग हमारी स्वाधीनता के सशस्त्र संग्राम का एक तीर्थस्थल है, जिसकी ओर न जाने क्यों शासन का ध्यान कम ही है।

भारतीय संविधान के निर्माता डा. भीमराव अम्बेडकर

संविधान के निर्माता डा. अम्बेडकर

भारतीय संविधान के निर्माता डा. भीमराव अम्बेडकर का जन्म 14 अप्रैल, 1891 को महू (म.प्र.) में हुआ था। उनके पिता श्री रामजी सकपाल तथा माता भीमाबाई धर्मप्रेमी दम्पति थे। उनका जन्म महार जाति में हुआ था, जो उस समय अस्पृश्य मानी जाती थी। इस कारण भीमराव को कदम-कदम पर असमानता और अपमान सहना पड़ा। इससे उनके मन का संकल्प क्रमशः दृढ़ होता गया कि उन्हें इस बीमारी को भारत से दूर करना है।

विद्यालय मे उन्हें सबसे अलग बैठना पड़ता था। प्यास लगने पर अलग रखे घड़े से पानी पीना पड़ता था। एक बार वे बैलगाड़ी में बैठ गये, तो उन्हें धक्का देकर उतार दिया गया। वह संस्कृत पढ़ना चाहते थे, पर कोई पढ़ाने को तैयार नहीं हुआ। एक बार वर्षा में वह एक घर की दीवार से लगकर बौछार से स्वयं को बचाने लगे, तो मकान मालकिन ने उन्हें कीचड़ में धकेल दिया।

इतने भेदभाव सहकर भी भीमराव ने उच्च शिक्षा प्राप्त की। गरीबी के कारण उनकी अधिकांश पढ़ाई मिट्टी के तेल की ढिबरी के प्रकाश में हुई। यद्यपि सतारा के उनके अध्यापक श्री अम्बा वाडेकर, श्री पेंडसे तथा मुम्बई के कृष्णाजी केलुस्कर ने उन्हें भरपूर सहयोग भी दिया। जब वे महाराजा बड़ोदरा के सैनिक सचिव के नाते काम करते थे, तो चपरासी उन्हें फाइलें फंेक कर देता था।

यह देखकर उन्होंने नौकरी छोड़ दी तथा मुम्बई में प्राध्यापक हो गये। 1923 में वे लन्दन से बैरिस्टर की उपाधि लेकर भारत वापस आये और वकालत करने लगे। इसी साल वे मुम्बई विधानसभा के लिए भी निर्वाचित हुए; पर छुआछूत की बीमारी ने यहां भी उनका पीछा नहीं छोड़ा।

1924 में भीमराव ने निर्धन और निर्बलों के उत्थान हेतु ‘बहिष्कृत हितकारिणी सभा’ बनायी और संघर्ष का रास्ता अपनाया। 1926 में महाड़ के चावदार तालाब से यह संघर्ष प्रारम्भ हुआ। जिस तालाब से पशु भी पानी पी सकते थे, उससे पानी लेने की अछूत वर्गाें को मनाही थी। डा0 अम्बेडकर ने इसके लिए संघर्ष किया और उन्हें सफलता मिली। उन्होंने अनेक पुस्तकंे लिखीं तथा ‘मूकनायक’ नामक पाक्षिक पत्र भी निकाला।

इसी प्रकार 1930 में नासिक के कालाराम मन्दिर में प्रवेश को लेकर उन्होंने सत्याग्रह एवं संघर्ष किया। उन्होंने पूछा कि यदि भगवान सबके हैं, तो उनके मन्दिर में कुछ लोगों को प्रवेश क्यों नहीं दिया जाता ? अछूत वर्गों के अधिकारों के लिए उन्होंने कई बार कांग्रेस तथा ब्रिटिश शासन से संघर्ष किया।

भारत के स्वतन्त्र होने पर उन्हें केन्द्रीय मन्त्रिमंडल में विधि-मन्त्री की जिम्मेदारी दी गयी। भारत का नया संविधान बनाने के लिए गठित समिति के वे अध्यक्ष थे। इस नाते उन्हें 'आधुनिक मनु' कहना उचित ही है।

संविधान में छुआछूत को दंडनीय अपराध बनाने के बाद भी वह समाज में बहुत गहराई से जमी थी। इससे वे बहुत दुखी रहते थे। अन्ततः उन्होंने हिन्दू धर्म छोड़ने का निश्चय किया। यह जानकारी होते ही ईसाई और मुसलमान नेता उनके पास तरह-तरह के प्रलोभन लेकर पहुँच गये; पर भारतभक्त डा. अम्बेडकर जानते थे कि इन विदेशी मजहबों में जाने का अर्थ देश से द्रोह है। अतः विजयादशमी (14 अक्तूबर, 1956) को नागपुर में अपनी पत्नी तथा हजारों अनुयायियों के साथ उन्होंने भारत में जन्मे बौद्ध मत को अंगीकार किया। यह भारत तथा हिन्दू समाज पर उनका बहुत बड़ा उपकार है।

Chatrapati Shivaji Maharaj the king of India

परवा एका IT क्षेत्रातली व्यक्ति मला म्हणाली तुला "अरे तुला शिवाजीत एवढा इंटरेस्ट का आहे ?
जगात इतके पराक्रमी राजे आहेत ?
सारखं आपलं शिवाजी शिवाजी. तो थोडीच जगातला सगळ्यात पराक्रमी राजा होता?"
त्याला मी म्हणालो नीट ऐक,
"मी जाणिवपूर्वक विधान करतो की शिवाजी महाराज हे सतराव्या शतकातले आंतरराष्ट्रीय किर्तीचे सेनानी होते. जगात तुलना नाही असे राजे होते..."
माझं बोलणं मध्येच तोडत ती व्यक्ती म्हणाली
"सिध्द करून दाखव"
मी ठीक आहे म्हणलं. तसंही लायब्ररीतील बरीचशी जनता डोकावून पाहत होती...
यापेक्षा चांगली संधी नाही, मी म्हंटलं...
महाराजांनी त्यांच्या 50 वर्षाच्या कारकिर्दीत जेवढे सेनानी पराभूत केले त्यातले फक्त दोघेच भारतीय होते.
बाकी सगळे परकीय होते. त्यांच्या त्यांच्या देशाचे मानांकित सेनानी होते.....
शिवरायांनी पराभूत केलेले सेनानी पाहु - ज्याची लाल महालात बोटं छाटली
तो शाहिस्तेखान तो अबु-तालिबानचा नबाब,
तुर्कस्तानचा नबाब आहे.
तो प्रतिऔरंगजेब या नावाने ओळखला जायचा, औरंगजेबाचा सक्खा मामा आहे तो.
बंगाल प्रांत जिंकुन दिलाय त्याने.. असा बलाढ्य सेनानी महाराजांनी एका रात्रीत तीन बोट छाटली.... पहाट व्हायच्या आत गायब झाला तॊ पुन्हा नाही आला...
तो बहलोलखान पठाण सिकंदर चिडरखान पठाण हे सगळे पठाण अफगाणी आहेत. अफगाणीस्तानचे आहेत हे..
तो दिलेरखान.. मंगोलियन आहे तो, बाबा... मंगोलिया देशाचा सर्वोत्तम योद्धा... महराजांनी त्याचा पराभव केला.
सिद्धि जौहर, सिद्धी सलाबत खान हे सगळे इराणी आहेत. इराण चे आहेत सर्वोत्तम योद्धे आहेत महाराजांनी त्यांचा पराभव केला.
आणि इथं लोणावळ्याच्या उंबरखिंडीत ज्याचा कोंडून पराभव केला...असा की गिनिज बुकला सुद्धा त्याची नोंद घ्यावी लागली की जगातल्या सगळ्यात कमी सैन्याने जास्तित जास्त सैन्याचा पराभव केला
( एक हजार विरुद्ध 30 हजार आणि 30 हजारंचा संपूर्ण पराभव 1000 मधला एकही मावळा न गमावता )
तो कहार्तलब खान तो उझबेकिस्तान म्हणजे आताच्या ताश्कंद रशियाचा आहे त्याचा पराभव केला.
इंग्रज-गवर्नर लिहितो की शिवाजी महाराज जर अजून 10 वर्षे जगले असते तर इंग्रजांना पूर्ण हिंदुस्तानचा नीट चेहरा पाहता सुध्दा आला नसता...
सतराव्या शतकात लंडन मध्ये 3 वृत्तपत्रे प्रकाशीत होत होती. त्यामध्ये लंडन गॅझेट नावाचं वृत्तपत्र होत . शिवाजी महाराज ज्यावेळी आग्र्याहून निसटले त्यावेळी या लंडन गॅझेट मध्ये पहिल्या पानावर ती बातमी छापून आलेली. त्यात शिवाजी महाराजांचा उल्लेख किंग ऑफ स्वराज्या असा नव्हता, किंग ऑफ मराठा असाही नव्हता.... तर त्यात माझ्या राजांचा उल्लेख
Shivaaji the king of India असा होता...
व्हियेतनाम नावाचे छोटसं राष्ट्र आहे हो राष्ट्रचं, आपल्या पुणे जिल्ह्याएवढेपण नसेल. व्हिएतनामचं आत्ताची महासत्ता अमेरिकेसोबत गेली 35 वर्षे युद्ध सुरू होते. पण या युध्दात अमेरिकेला विजय मिळाला नाही. का माहितीये कारण--
त्या व्हिएतनामच्या चौकात शिवाजी महाराजांचा पुतळा आहे.... त्या व्हिएतनामचा स्वातंत्र्यसेनानी "हू जी मीन" नांव त्याचे. त्याच्या समाधीवर लिहून ठेवलंय शिवाजी महाराजांचा एक मावळा येथे चीरविश्रांती घेतोय....
अमेरिकेच्या बोस्टन विद्यापीठात"शिवाजी द मॅनेजमेंट गुरू" या विषयावर 100 मार्काँचा पेपर घेतला जातो.
जगातली 112 राष्ट्र शिवरायांच्या गोरील्ला warfair (युधतंत्र) चा वापर आपल्या अभ्यासक्रमात करतात.
पाकिस्तानच्या पाठ्यपुस्तकात शिवरायांचा अभ्यासक्रम शिकवला जातो.
मी म्हणालो आता तूच सांग सगळं जग शिवरायांचा अभ्यास करतंय तिथं माझ्या देशातल्या अभ्यासक्रमात किती वेळा शिवरायांचा उल्लेख आहे ?
तुम्ही इतिहास शिकलात त्या CBSC मध्ये 1700 पानांचे पुस्तक काढलंय. त्यात फक्त 4 ओळी आहेत शिवाजी महाराजां बद्दल म्हणून तुला ही माहिती नव्हती... म्हणुन तुम्ही असं म्हणालात...
औरंगजेबाने आयुष्यातीलं ऐन उमेदीची २७ वर्ष तब्बल.... हो २७ वर्ष या महाराष्ट्रात मराठ्यांशी निकाराची झुंज देण्यात वाया घालवली.
त्याने हिच २७ वर्ष इतर कुठल्याही ठिकाणी घालवली असती तर कदाचीत ही अर्धी पृथ्वी त्याच्या अधिपत्याखाली आली असती... इतक्या प्रचंड शक्तीशाली फौजेचा तो बादशाह होता पण मराठ्यांनी त्याला दिल्लीचे तख्त पुन्हा पाहु दिले नाही...
कारण अख्ख्या जगाला माहिती आहे..की छत्रपती शिवाजी महाराज काय होते. पण भारतातील लोकांनाच माहित नाही.....
*जय शिवराय*